श्रीलाल शुक्ल के व्यंग्य और समाज की बात

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श्रीलाल शुक्ल जी अपने परिवेश और समाज से रु-ब-रु थे और अपनी पैनी दृष्टि से उसको देखते थे.
हर युग में लिखा गया साहित्य तत्कालीन सामाजिक परिवेश की भूमिका पर रचा जाता है। उसमें अपने समय-समाज का अक्स साफ देखा जा सकता है। एक जागरुक साहित्यकार अपने समाज में व्याप्त विसंगतियों, विडम्बनाओं, प​रम्पराओं, संस्कृति आदि का साक्षी होता है और उन्हीं में से अपने रचनाकर्म के लिए कथ्य चुनता है। श्रीलाल शुक्ल जी अपने परिवेश और समाज से रु-ब-रु थे और अपनी पैनी दृष्टि से उसको देखते थे। बेहद सरल और बेहद गूढ़ दोनों ही तरह के विषयों को उन्होंने अपनी रचनाओं में उठाया है।

उन्हें ज़िन्दगी में गहरा विश्वास है और वे जीवन रस की अंतिम बूँद तक का अनुभव करना चाहते हैं। वहीं उनके व्यंग्य की धार इतनी तेज है कि वह पाठक के मन पर गहरी चोट कर जाती है। उनकी लेखन प्रक्रिया अन्य लेखकों से कुछ अलग है। इस शोधग्रन्थ में शुक्ल जी की व्यंग्यपरक रचनाओं के विविध आयामों का अध्ययन प्रस्तुत किया जा रहा है।

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इस शोध प्रबन्ध के प्रथम अध्याय में व्यंग्य की उत्पत्ति, अर्थ तथा भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानों द्वारा प्रतिपादित व्यंग्य की परिभाषा की चर्चा हुई है। भारतेन्दु युग से द्विवेदी युग, शुक्ल युग, शुक्लोत्तर युग यानी कि अब तक के व्यंग्य की विकास परम्परा को दिखाया गया है। इसमें भारतेन्दु युग से अब तक के मुख्य व्यंग्यकारों तथा उनके लेख पर बात हुई है।

दूसरे अध्याय में शुक्ल जी के पारिवारिक परिवेश, उनके बचपन, शिक्षा, आजीवि​का तथा सम्मान एवं पुरस्कार आदि के सन्दर्भ में परिचय दिया गया है। उनकी रचनाओं का संक्षिप्त परिचय तथा शुक्ल जी की व्यंग्य सम्बन्धी अवधारणा पर विचार किया गया है।

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तीसरे अध्याय में शुक्ल जी के सम्पूर्ण साहित्य विधा में सामाजिक स्थितियों पर हुए व्यंग्य को केन्द्र में रखा गया है। इसके अन्तर्गत वर्ग एवं वर्ण व्यवस्था, बदलते सामाजिक-पारिवारिक सम्बन्ध, दिशाहीन युवावर्ग, विवाह सम्बन्धी सामाजिक दृष्टिकोण, मूल्यों का विघटन, नारी जीवन की विसंगतियाँ, बुद्धिजीवी पूंजीपति समाजसेवक, अपराधी वर्ग आदि सन्दर्भों की चर्चा की गयी है।

चौथे अध्याय में शुक्ल जी के व्यंग्य साहित्य के राजनीतिक पक्ष की विवेचना की गयी है।

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अध्याय पाँच में श्रीलाल शुक्ल के साहित्य में आर्थिक विसंगतियों को केन्द्र में रखा गया है। इस अध्याय में प्रशासनिक भ्रष्टाचार एवं निष्क्रियता अफ़सरशाही, पुलिस तन्त्र, भ्रष्ट एवं स्वार्थलोलुप नेतृत्व, वोट की राजनीति एवं चुनाव, प्रजातन्त्र की विसंगतियाँ, दल बदल, कुर्सी की लालसा, राजनीति और अपराध, सरकारी नीतियों सम्बन्धी विसंगतियों के बारे में शुक्ल जी की व्यंग्य रचनाओं का मूल्यांकन करने का प्रयास किया गया है। अध्याय छ: श्रीलाल शुक्ल जी के साहित्य में धर्म एवं संस्कृति के विविध पहलुओं पर व्यंग्य से सम्बन्धित है। अध्याय सात में श्रीलाल शुक्ल के साहित्य में शिक्षाजगत में व्याप्त भ्रष्टाचार एवं साहित्यिक विसंगतियों का विवेचन किया गया है।

आठवें अध्याय में शुक्ल जी के साहित्य में व्यक्तिपरक व्यंग्य को आधार बनाकर शोध किया गया है और नौंवे अध्याय में शोधग्रन्थ का मूल्यांकन किया गया है।

-डॉ. अर्चना दुबे.

श्रीलाल शुक्ल : व्यंग्य के नए आयाम
लेखिका : डॉ. अर्चना दुबे
प्रकाशक : वाणी प्रकाशन
पृष्ठ : 222
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