चाणक्य चिन्तन : आन्वीक्षिकी और विचार करने की कला

अर्थशास्त्र में ऐसी बहुत-सी अवधारणायें हैं जो अभी भी आज के कॉर्पोरेट जगत पर लागू की जा सकती हैं..
'इस पुस्तक में हम एक बहुत दिलचस्प चीज़ पेश करेंगे : सोचने की कुछ पद्धितियां और तकनीकें, चिन्तन का फ़लसफ़ा और सोचने के वैकल्पिक ढंग। यह पुस्तक सरल किन्तु गहरी है। यह आपको एक ऐसी चीज़ की ओर ले जाएगी जो आपके दिमाग और बुद्धि को आन्दोलित कर देगी। एक निश्चित लेकिन सूक्ष्म तरीके से ये आपके सोचने के ढंग को बदल देगी। ये जीवन-मात्र के बारे में आपके दृष्टिकोण में एक नया आयाम जोड़ेगी।' लेखक राधाकृष्णन पिल्लई का यह कथन उनकी इस पुस्तक का एक तरह से सार है। उन्होंने पुस्तक को एक साइलेंट किलर भी कहा है। इसके पीछे उनका मत है कि यह हमारे अतीत की बहुत-सी गलतफहमियों को खत्म करने में सहायक होगी। हमारे अज्ञान को नष्ट कर हमारा परिचय पहले से अधिक सुख से कराएगी। लेखक पिल्लई इस प्रक्रिया को चिन्तन के अभियान के नाम से पुकारते हैं।

'चाणक्य चिन्तन : आन्वीक्षिकी और विचार करने की कला' का प्रकाशन मंजुल पब्लिशिंग हाउस ने किया है। इस पुस्तक के लेखक हैं राधाकृष्णन पिल्लई जिन्होंने चाणक्य पर गहन अध्ययन किया है। उन्होंने चाणक्य पर कई किताबें लिखी हैं जिनमें कॉर्पोरेट चाणक्य, चाणक्य इन यू आदि चर्चित नाम शामिल हैं।

चाणक्य से सभी परिचित हैं। उन्हें हम कौटिल्य के नाम से भी पुकारते हैं। 'कौटिल्य का अर्थशास्त्र' नामक पुस्तक में चाणक्य ने करीब 180 विषयों पर चर्चा की है। इसमें 6000 सूत्र शामिल हैं। यहाँ अर्थशास्त्र के मर्मज्ञों, विशेषज्ञों और गुरुओं के अलग-अलग अनुभवों को एक जगह लिखा गया है। लेखक राधाकृष्णन पिल्लई के अनुसार चाणक्य की पुस्तक में प्राचीन और शाश्वत ज्ञान समाहित है। 'अर्थशास्त्र' शब्द चाणक्य का गढ़ा हुआ नहीं है। यह हमारे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में मिलता है। महाभारत में भी अर्थशास्त्र पर विस्तारपूर्ण चर्चा है। इस ग्रंथ को राजनीति, अर्थनीति और युद्धकला की विद्या भी माना जाता है। अर्थशास्त्र शासन, नेतृत्व और रणनीति से संबंध रखता है।
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राधाकृष्णन पिल्लई ने पुस्तक में लिखा है कि चाणक्य ने गहन अध्ययन किया होगा। उन्होंने नोट्स तैयार किए और एक ग्रंथ की रचना की। उनकी यह रचना दूसरों के कृतित्व पर आधारित होने के बावजूद भी मौलिक है। उनकी व्याख्या और प्रस्तुति अलग तरह की है।

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इस पुस्तक में हम 'आन्वीक्षिकी' पर चर्चा करेंगे। यह एक संस्कृत शब्द है जो 'अनु' और 'इक्षिकी' से मिलकर बना है। अनु का मतलब 'अणु' यानी किसी वस्तु का सूक्ष्म अंश और इक्षिकी का अर्थ होता है -'वह जो जानना चाहता है'। लेखक के अनुसार आन्वीक्षिकी परीक्षण और उचित चिंतन की प्रक्रिया या चिंतन का शास्त्र है। वैसे आन्वीक्षिकी महाभारत में द्रोपदी का एक नाम भी था। यह शब्द हमें नया और अलग लगे, लेकिन प्राचीन काल में यह ख़ासा लोकप्रिय था।

चाणक्य का मानना था कि आन्वीक्षिकी का अध्ययन शिक्षा-व्यवस्था की नींव की तरह काम कर सकता है। इसलिए वे इसे पहला विषय चाहते हैं यानी चिंतन से शिक्षा की शुरुआत हो तो कितना बेहतर हो। ऐसा करने से भविष्य के लिए जो मानव तैयार होंगे वे मानसिक तौर पर मजबूत, कल्पनाशील, जिज्ञासू और परिपक्व होंगे। नेतृत्व में सक्षम होना और उचित समय पर सही निर्णय लेने का गुण प्रारंभ से ही विकसित होता है। इसलिए चाणक्य ने अपने शिष्यों को भविष्य के लिए तैयार करने की प्रक्रिया आन्वीक्षिकी से शुरु की।

चार विद्याएँ जिन्हें विद्यार्थियों को पढ़ना चाहिए उनमें सबसे पहले चिंतन की विद्या यानी आन्वीक्षिकी, ​उसके बाद वेद (त्रयी), संपत्ति शास्त्र (वार्ता) और राजनीति विद्या (दण्डनीति)।

सबसे पहले शिक्षा-प्रणाली की रुपरेखा पर चाणक्य ने विचार किया है। उनके अनुसार विद्यार्थी को मालूम होना चाहिए कि वह क्या पढ़ने जा रहा है। यह हमारा पाठ्यक्रम या सिलेबस है। पुस्तक कहती है कि आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता और दण्डनीति मिलकर एक राजा के ज्ञान की रचना करती हैं।

लेखक राधाकृष्णन पिल्लई के अनुसार जब चार विद्याओं का ज्ञान हो जाता है तो सांसारिक और आध्यात्मिक ज्ञान आ जाता है। इसलिए वह कहते हैं -'आप भौतिक रुप से समृद्ध और आध्यात्मिक रुप से दरिद्र नहीं हो सकते। आपको महज आध्यात्मिक रुप से सफल और सांसारिक रुप से विफल नहीं होना चाहिए।' लेखक ने आन्वीक्षिकी को चिन्तन का अत्यन्त व्यावहारिक ढंग बताया है।

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आन्वीक्षिकी के पालन के लिए लेखक ने तीन चीज़ों पर विचार करने की सलाह दी है। उन्होंने धर्म और अधर्म, भौतिक लाभ और हानि तथा सुनीति और कुनीति पर विचार करना आवश्यक बताया है।  यह इसलिए जरुरी है क्योंकि किसी भी कार्य को करने से पूर्व उसके हर पक्ष को जानना आवश्यक है। उचित निर्णय के लिए आकलन होना चाहिए, ताकि उसके बेहतर परिणाम आ सकें।

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आन्वीक्षिकी के लाभों पर चर्चा करते हुए राधाकृष्णन पिल्लई कहते हैं कि यह विचार, वाणी और कर्म में चतुराई पैदा करती है। यह जीवन के हर क्षेत्र में एक मार्गदर्शक की तरह कार्य करती है। चाणक्य ने इसे अँधेरे में दीपक की तरह रास्ता दिखाने वाला कहा है।

लेखक के अनुसार आन्वीक्षिकी की ख़ास बातें-
◻️ चिंतन का एक स्वार्थपूर्ण तरीका है.
◻️ हर किसी का हित करती है.
◻️ हर परिस्थिति में बुद्धि स्वस्थ रखती है.
◻️ हमें स्थिरचित तथा शांत रखती है.
◻️ संतुलन कायम रखती है.
◻️ सही कर्म करने का साधन और पद्धति है.

'चाणक्य चिन्तन' में हम चिंतन के रुपों को विस्तार से जानेंगे। सबसे पहले लेखक ने द्विपक्षीय चिन्तन की चर्चा की है। इसके अनुसार हमें दो पक्षों को देखकर ही निर्णय लेना चाहिए। यह जरुरी भी है, क्योंकि कई बार ​परिस्थितियाँ इस प्रकार की होती हैं कि दोनों पक्षों की राय महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। पिल्लई कहते भी हैं कि जब आप किसी मसले के दोनों पक्षों को देखते हैं, तब आपका चिन्तन विकसित होता है। यही वजह है कि चाणक्य अर्थशास्त्र की शुरुआत में शुक्र और बृहस्पति दोनों को प्रणाम करते हैं। शुक्र असुरों के गुरु और बृहस्पति देवताओं के गुरु थे।

'ओम् नम: शुक्र बृहस्पति अभ्यम्'
(शुक्र और बृहस्पति को प्रणाम)

दूसरा चिन्तन है वैकल्पिक चिन्तन। इसके तहत चार उपायों वाली प्रक्रिया 'साम, दान, भेद, दण्ड' कहलाती है। लेखक ने कहा है कि हमें अपनी मानसिकता को 'समस्या-केन्द्रित' नहीं, बल्कि 'समाधान-केन्द्रित' करने की आवश्यकता है। इस प्रक्रिया का प्राथमिक तौर पर इस्तेमाल सैन्य रण​नीति के लिए किया गया था। चाणक्य इसका उपयोग विदेश नीति, अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध, अपराध की पहचान, कानून अैर व्यवस्था तथा दण्ड जैसे क्षेत्रों में करने की बात करते हैं।

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राधाकृष्णन पिल्लई ने नेतृत्व सम्बन्धी चिन्तन के बारे में कहा है कि यह एक सर्व-समावेशी चिन्तन है जिसके तहत राजा को जिम्मेदार होना चाहिए, आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए, विचारशील-कल्पनाशील होना चाहिए तथा हितकारी होना चाहिए।

लेखक ने सृजनात्मक चिन्तन के क्रियान्वयन की दो अवधारणायें बतायी हैं -सही समय और समय का सही चुनाव। सृजनात्मकता इसमें है कि क्या किया जाए, इसमें भी कि क्या न किया जाए। इसपर चाणक्य ने विस्तार से चर्चा 'हस्त्याध्यक्ष' नामक अध्याय में की है। उन्होंने कहा है कि हमारा ध्यान सृजनात्मक होना चाहिए, अमानवीय या विध्वंसक नहीं होना चाहिए। प्रकृति के मार्गदर्शन में कार्य करना चाहिए। इसलिए उन्होंने कुदरती रुप से सृजनात्मक बनने पर जोर दिया है।

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कल्पनाशील चिन्तन के विषय पर चाणक्य ने शतरंज के खेल से माध्यम से समझाया है। उनके अनुसार शतरंज में महत्वपूर्ण यह है कि हमें शत्रु के व्यूह को तोड़ने और उसे मात देने के लिए लगातार अपनी रणनीति बदलने की आवश्यकता है। इसीलिए चाणक्य सामने वाले व्यक्ति को समझने की सीख देते हैं।

चाणक्य का मानना है कि हर किसी को आध्यात्मिकता की बुनियाद पर भौतिक सफलताओं का आनन्द लेना चाहिए तथा सभी सांसारिक आकांक्षाओं को पूर्ण करना चाहिए। धर्म, अर्थ और काम जीवन में संतुलित होना चाहिए। यही आध्यात्मिक चिन्तन है।

चिन्तन के विभिन्न प्रतिरुपों पर चर्चा करते हुए लेखक राधाकृष्णन पिल्लई ने कहा है कि नेतृत्वकर्ता जो भी गतिविधि करे वह ऊर्जा, दृढ़ता और आवेग से परिपूर्ण होनी चाहिए। सफल नेतृत्व के लिए कर्तव्य पहला कदम है। कथनी को करनी में ढालने से एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत किया जा सकता है। उसे सभी की समृद्धि के बारे में सोचना चाहिए। पिल्लई ने यहाँ चिन्तन के प्रशासनिक प्रतिरुप को भी विस्तार से समझाया है जिसमें उन्होंने 'डिजाइन थिकिंग' का जिक्र किया है। प्रशासकों के लिए ईमानदारी के चार परीक्षणों को भी बताया गया है।
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चाणक्य के विषय में लेखक लिखते हैं कि चाणक्य लोगों के दिमाग पर भरोसा नहीं करते थे। ऐसा इसलिए क्योंकि मानव मन चंचल होता है। चाणक्य राजा और उसके अमात्यों पर निगाह रखना जरुरी समझते थे।

पुस्तक में हमें चाणक्य द्वारा बताए गए चिन्तन के सात आयामों का विस्तृत वर्णन पढ़ने को मिलता है। लेखक के मुताबिक हम इन सात अंगों से यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं -'एक अच्छा नेतृत्वकर्ता, अच्छे मंत्रियों के मार्गदर्शन में, अच्छी मूलभूत सुविधाओं, समृद्ध कोष, मजबूत और अनुशासित सेना और अच्छे विदेशी सम्बन्धों के साथ लोगों के सुख के लिए काम करता हुआ एक महान राज्य की रचना करता है।'

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इसके अलावा चाणक्य ने चिन्तन के आठवें आयाम 'शत्रु' को भी बताया है। किताब कहती है कि यदि हम शत्रु के बारे में सोचेंगे तो हम उसकी चाल जो हमारे लिए भविष्य में घातक हो सकती है, उसे पहले से समझ सकते हैं। इसके लिए चाणक्य ने कई रणनीतियों, सिद्धांतों आदि पर चर्चा की है ताकि शत्रु को पराजित किया जा सके। पढ़ना दिलचस्प होगा कि राधाकृष्णन पिल्लई ने यहाँ विषकन्या या हनीट्रैप का जिक्र भी किया है। पुस्तक में शत्रु के सकारात्मक पहलू भी बताए गए हैं।

निर्वासन में रहते हुए भी राजा को अपना समय और उद्यम बरबाद नहीं करने चाहिए। उसे शत्रु पर आक्रमण के अगले मौके के लिए तैयारी करनी चाहिए। अगली बड़ी कार्रवाई की तैयारी भी आन्वीक्षिकी है।
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पुस्तक में चाणक्य के पाँच कोमल पक्षों को विस्तार से समझाया गया है। वहीं प्रबंधन पर बहुत ही अच्छी तरह चर्चा की गयी है। पिल्लई कहते हैं कि अर्थशास्त्र में ऐसी बहुत-सी अवधारणायें हैं जो अभी भी आज के कॉर्पोरेट जगत पर लागू की जा सकती हैं। प्रबंधन के कुछ ऐसे सिद्धांत जो शाश्वत हैं और समय के साथ बदलते नहीं। किताब के अनुसार यदि प्रबंधन के मजबूत और प्रभावशाली सिद्धांतों का उपयोग किया जायेगा तो कंपनी, संस्था, संगठन ही नहीं बल्कि इसका असर व्यापक होगा। इससे पूरा राष्ट्र प्रभावित होगा और वह विकसित होगा। इसके अलावा राधाकृष्णन पिल्लई ने मानवीय और दैवीय चिन्तन पर भी बारीकी से समझाया है।

कुल मिलाकर यह पुस्तक चाणक्य को, उनकी नीतियों को और उनके जरिए होने वाले प्रभावों को समझने का एक बेहतर ज़रिया है।

चाणक्य चिन्तन : आन्वीक्षिकी और विचार करने की कला
लेखक : राधाकृष्णन पिल्लई
अनुवाद : मदन सोनी
प्रकाशक : मंजुल पब्लिशिंग हाउस
पृष्ठ : 180
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