भगवा का राजनीतिक पक्ष : वाजपेयी से मोदी तक

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1980 से भाजपा की स्थापना से लेकर उसके दो बार सत्तारुढ़ होने की यात्रा-कथा है.
सबा नक़वी लंबे समय से भारतीय राजनीति को करीब से देख रही हैं। उन्होंने दो दशक तक भाजपा को कवर किया है।

'भगवा का राजनीतिक पक्ष : वाजपेयी से मोदी तक' का प्रकाशन वाणी प्रकाशन ने किया है। तृणा मुकर्जी ने पुस्तक का हिन्दी अनुवाद किया है।

सबा नक़वी ने 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी का शपथ ग्रहण समारोह कवर किया जिसका जिक्र उन्होंने बेहद दिलचस्प अंदाज़ में किया है। हालांकि उन्होंने यह भी लिखा है कि 'इस ख़ास दिन अटल जी कुछ बदमिज़ाज और अप्रसन्न थे।' इसका कारण भी लिखा गया है। दरअसल वाजयेपी अपने करीबी जसवंत सिंह को सरकार में वित्तमंत्री बनाने के इच्छुक थे, लेकिन आरएसएस को यह मंजूर नहीं था। सबा लिखती हैं,'उस वक्त आरएसएस को एक ऐसा वित्तमंत्री चाहिए था जो उनके अपने परिभाषित स्वदेशी ब्राण्ड के अर्थशास्त्र की, उसकी संरक्षण वाली नीतियों की, तत्परता और सख़्ती से प्रचार और वकालत करे।' बाद में जसवंत सिन्हा को वित्तमंत्री बनाया गया। वाजपेयी को यह 'नामंजूर था कि वित्त मंत्रालय आरएसएस अपने उम्मीदवार के ज़रिये चलाये।' वे आरएसएस के दवाब में नहीं आते थे। सबा नक़वी द्वारा जयललिता का सरकार की 'चूलें हिलाने' वाला किस्सा पहले अध्याय में दर्ज किया गया है।

जनसंघ 1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने स्थापित की। 1977 में जनसंघ का दूसरी पार्टियों के साथ विलय हुआ। आपातकाल के दौरान जनता दल अस्तित्व में आया, लेकिन वह कुछ समय में ही बिखर गया। फिर 6 अप्रैल, 1980 को भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई जिसके पहले अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी थे।

लेखिका सबा नक़वी के मुताबिक उन्होंने 1997 से भाजपा पर लिखना शुरु किया। वे जनसंघ से जुड़े शीर्ष नेता नानाजी देशमुख से मिलीं। इस दौरान बातचीत में नानाजी ने कहा,'हमारे देश में हिन्दू-मुसलमानों को लेकर कोई समस्या ही नहीं है। ...जहाँ तक हिन्दू राष्ट्र का सवाल है, वो श्लेष (वर्ड प्ले) के अलावा और कुछ नहीं है।'

1984 के संसदीय चुनाव में भाजपा के पास मात्र दो सांसद थे। खुद अटल बिहारी वाजपेयी अपने संसदीय क्षेत्र ग्वालियर में माधवराव सिंधिया से दो लाख वोटों से शर्मनाक तरीके से पराजित हुए। भाजपा ने राजनीतिक ज़मीन पर बने रहने के लिए अलग-अलग तरीके अपनाने की शुरुआत कर दी थी। 6 दिसम्बर, 1992 को बाबरी मस्जिद ​के ध्वंस के बाद हालात बदलने लगे थे। राम मंदिर आंदोलन से अटल बिहारी वाजपेयी बचकर खेल रहे थे या वे अंदरखाने वही चाहते थे तो वीएचपी चाहती थी? इसका उत्तर पुस्तक पढ़कर जाना जा सकता है। लेकिन सबा नक़वी ने एक वाकया अपनी यादों के ज़रिए ताज़ा किया है। गुजरात के सूरत में एक कार्यकर्ता ने 'जय श्रीराम' का नारा जोर से लगाया तो वाजपेयी ने थोड़ी ख़ीज के साथ बोला,'बोलते रहो जय श्रीराम और करो मत कोई काम।'

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एक साक्षात्कार में जब वाजपेयी से भाजपा और आरएसएस के संबंधों के विषय में पूछा गया तो उन्होंने कहा था कि दोनों की विचारधारा और दृष्टिकोण अलग है। जब दिसंबर 1997 में 11वीं लोकसभा भंग हुई तो भाजपा ने दिल्ली में अपना पहला अखिल भारतीय मुस्लिम युवा सम्मेलन आयोजित किया था। उस सम्मेलन में 'जय श्रीराम' के नारे न लगाने की हिदायत दी गयी थी। मंच पर मुस्लिम नायकों आदि पर खूब चर्चा होती रही। लालकृष्ण आडवाणी ने भी गंगा-जमुनी तहज़ीब का बखान किया। उन्होंने सूफी दरगाहों में जाने की बात की। आयोजन में जनसंघी नेता के द्वारा कहा गया -'राम-रहीम एक हैं, कृष्ण-काबा एक हैं।' यह भी कहा गया कि 'अटल जी अगर इस्लामाबाद से भी खड़े हो जायें कोई मुस्लिम उनका विरोध नहीं करेगा।'

1998 में भाजपा ने अपनी ऐसी छवि प्रस्तुत की, जो तब तक की उसकी सर्वाधिक मान्य और स्वीकृत छवि थी। समस्या यह उत्पन्न हुई कि पार्टी के ही एक वर्ग ने यह सुझाना आरम्भ किया कि यह मात्र एक 'मुखौटा' है। भाजपा के वाजपेयी दौर की कथा के उपकथानाक के बीज इसी में छुपे हैं।
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भाजपा के दिग्गज नेता के.एन. गोविन्दाचार्य ने अपने एक बयान से अखबारों को शानदार सुखियां उपलब्ध करायीं। उनका यह हमला वाजपेयी पर था जो बिल्कुल सीधा था -'वाजपेयी भाजपा की आन्तरिक शक्ति नहीं हैं, वो महज़ एक मुखौटा हैं और मुखौटा रंगमंच में ही उपयोगी होता है।' उसके बाद एक सम्मेलन में वाजपेयी ने तंज कसा -'प्रधानमंत्री को कोई दल नहीं बनाता, जनता प्रधानमंत्री को बनाती है।' सबा नक़वी ने जब गोविन्दाचार्य से उनकी पूर्व में 'मुखौटा' वाली टिप्पणी पर बात हुई तो उन्होंने कहा,'अटल और आडवाणी मेरे लिए राम और भरत सदृश्य हैं, और अटल जी रामायण के राम हैं।'

साध्वी ऋतंभरा ने अटल बिहारी वाजपेयी को 'आधा कांग्रेसी' का खिताब दिया था। विश्व हिन्दू परिषद के तत्कालीन मुखिया अशोक सिंघल के साथ उनकी बोलचाल ही बंद थी। वाजपेयी खुद को उदारवादी नेता के रुप में पेश करने से पीछे नहीं हटे।

सबा नक़वी ने अटल जी की कई नीजि जानकारियाँ और रोचक बातें लिखी हैं।

ग्वालियर की राजकुमारी हक्सर ने विवाह बी.एन. कौल से किया, लेकिन उनका रिश्ता वाजपेयी से ताउम्र रहा। उनकी बेटी नमिता को वे अपनी बेटी मानते थे। वाजपेयी 'अविवाहित' प्रधानमंत्री रहे जिनका परिवार भी था। उनके पास दो कुत्ते और एक बिल्ली भी थी।
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लेखिका ने वाजपेयी के विश्वासपात्र सेवक शिवकुमार का भी जिक्र किया है। पोखरण परमाणु परीक्षण पर भी सबा नक़वी ने विस्तार से चर्चा की है। पोखरण में परीक्षण के बाद अमेरिका ने भारत पर कई प्रतिबंध लगाए थे। भाजपा के तत्कालीन सचिव वेंकैया नायडू ने परमाणु परीक्षण का विरोध करने वालों को 'देशद्रोही' कहा ​था।

सबा लिखती हैं कि वाजपेयी के प्रधानमंत्री काल के कुछ महीनों बाद ही उनके अस्वस्थ होने की खबरें कुछ आरएसएस के सदस्य प्रसारित करने लगे। उस समय वाजपेयी 73 साल के थे और हिमाचल के मनाली में पांच दिन की छुट्टियां मनाने गये हुए थे। उधर डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी का एक बयान 'द एशियन एज' की सुखियां बना कि वाजपेयी जल्द ही कैंसर के इलाज के लिए विदेश जाने वाले हैं। लालकृष्ण आडवाणी उनकी अनुपस्थिति में तख्तापलट की कोशिश करेंगे। स्वामी ने इस मामले में सबूत तक पेश करने की बात कह डाली थी।

हालांकि उनके कैंसर पीड़ित होने की अफवाहें दफ़न हो गयीं मगर उसके बाद उनके कार्यकाल के बाद घुटनों की तकलीफ को लेकर विस्तृत चर्चायें होती रहीं।

अटल बिहारी वाजपेयी के लिए 13 अंक शुभ नहीं रहा। जहाँ 1996 में उनकी सरकार अपना बहुमत साबित न कर पाने की वजह से सिर्फ तेरह दिन ही चल पायी, वहीं 1999 में उनकी सरकार तेरह महीने ही टिक पायी और संसद में अविश्वास प्रस्ताव मात्र एक वोट से हारी।
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कारगिल युद्ध का जिक्र करते हुए लेखिका कहती हैं कि इस दौरान भारत भारी उकसावे के बावजूद नैतिकता का दामन कसकर थामे रहा और जवाबी हमले के प्रलोभन से खुद को दूर रखने में सफल रहा। कारगिल युद्ध न केवल भारत के सैन्य विजय के रुप में देखा गया, बल्कि यह भारत के प्रधानमंत्री की नैतिक विजय भी रही।


1999 के चुनाव अभियान के दौरान निजि हमले किए गए। बायानवीरों ने हदों को पार किया और कुछ भी कह गए। सोनिया गाँधी पर सबसे अधिक हमले हुए। वहीं प्रमोद महाजन जैसे शीर्ष नेताओं ने सोनिया को मोनिका लेवेंस्की तक कहकर बाद में मुकर गए। उसी तरह महाजन ने शरद पवार पर भी गिरी हुई टिप्पणी की। कांग्रेस की ओर से भी वाजपेयी के निजि जीवन, उनके दत्तक परिवार पर कीचड़ उछाला गया। सबा नक़वी के अनुसार 'एक बड़ा क्रूर, रोमांचक चुनावी अभियान' में भाजपा को 182 सीट हासिल हुईं जबकि कांग्रेस को मात्र 114 सीटें।
सबा ने बताया है कि कभी नरेन्द्र मोदी लालकृष्ण आडवाणी के बेहद करीबी हुए करते थे। उन्होंने मोदी का एक कथन लिखा है -'हमारे युद्ध के रथी वो ही हैं। महाभारत में कृष्ण थे, यहाँ लालकृष्ण हैं।'

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पुस्तक में कन्दहार अपहरण काण्ड पर भी विस्तार से लिखा गया है। यह घटना 24 दिसंबर, 1999 में वाजपेयी के 75वें जन्मदिन से एक दिन पूर्व की है जब इंडियन एयरलाइन्स के विमान का पांच शस्त्रधारी आतंकवादियों ने काठमाण्डू से अपहरण कर लिया था। विमान में 178 यात्री और 11 चालक दल के सदस्य थे शामिल थे। सात दिन तक चले इस अपहरण-संकट में अहमद ओमर सईद शेख, मसूद अज़हर और मुश्ताक अहमद की रिहाई हुई। तब इंडिया टुडे में सबा नक़वी अपना कार्यकाल समाप्त कर रही थीं। अब तक सबा के मन में उस काण्ड से जुड़े कुछ सवाल घूम रहे हैं, उनके अनुसार 'जिनके जवाब आज तक नदारद हैं, कुछ था जो मुझे सही नहीं लग रहा था।'

सबा नक़वी ने बेबाकी से इस पुस्तक में अपनी बात रखी है। जहाँ उन्होंने राजनीतिक गतिविधियों का हवाला दिया है वहीं उन्होंने साथ-साथ अपने पत्रकारिता जीवन के कुछ हल्के-फुल्के किस्से भी पाठकों से बाँटे हैं।

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मीडिया पर वे लिखती हैं कि अब यहाँ ध्रुवीकरण देखने को मिलता है जबकि नब्बे के दशक में किसी के साथ राजनीतिक मतभेद होते हुए भी बड़े अच्छे ताल्लुकात रहते थे।

सबा ने वीएचपी नेता गिरिराज किशोर के साथ एक किस्सा लिखा है जिसमें गिरिराज ने बड़े फख्र से ऐसी घड़ी का जिक्र किया जो गौमूत्र द्वारा उत्पादित 'बिजली' से चलती थी। उन्होंने सबा को गौमूत्र चूर्ण और साबुन भी भेंट किया तथा उनके निश्चित लाभ बताए।

किताब में बंगारू लक्ष्मण का भी जिक्र है। उनका स्टिंग ऑपरेशन हुआ, जेल गए, बाहर आए और 2014 में संसार त्याग गए। वह स्टिंग तहलका ने किया था।

वाजपेयी और आडवाणी के रिश्तों पर भी लेखिका ने विस्तार से लिखा है। उन अफवाहों के बारे में भी इस पुस्तक में पढ़ा जा सकता है जब वाजपेयी एक साल के कार्यकाल में ही अलग तरह की चर्चाओं के गर्म बाज़ार का हिस्सा थे। बातें यहाँ तक की जाने लगीं कि वाजपेयी की जगह कौन लेगा। इस सूची में लालकृष्ण आडवाणी सबसे ऊपर थे। इसमें ममता बनर्जी से लेकर नवीन पटनायक का नाम सामने आया।

सबा नक़वी लिखती हैं कि वाजपेयी को अपने प्रधानमंत्री कार्यकाल के दौरान अपने ही दल के साथ-साथ संघ का भी विरोध झेलना पड़ा था। उनके गिरते स्वास्थ्य की चर्चायें जारी थीं। यह सच था कि वाजपेयी को घुटनों की सर्जरी करवानी थी। जब स्वास्थ्य लाभ का समय खिंच गया तो 'भाजपा के अंदर कुनकुनाती अन्दरूनी राजनीति को गति प्रदान कर दी।' '...जहाँ हर चाल आडवाणी को बाहर रखने की हो रही थी, भले ही इससे भाजपा तबाह क्यों न हो जाए।'

लालकृष्ण आडवाणी ने सबा नक़वी को एक साक्षात्कार में कहा -'आरएसएस का वाजपेयी शासन पर एक नैतिक प्रभाव है, ठीक वैसे ही जैसे गाँधी जी का नेहरू शासन पर था। नेहरू, गाँधी जी की बड़ी इज़्ज़त करते थे पर उनके हर कहे के साथ एकमत नहीं होते थे।' यह बहुत बड़ी बात थी जिससे स्पष्ठ होता है कि वाजपेयी और आरएसएस के रिश्ते किस तरह के थे।

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2001 में भुज में आए भूकंप के बाद आरएसएस केशुभाई पटेल की जगह किसी दूसरे व्यक्ति को लाने में जुट गई। उन दिनों नरेंद्र मोदी दिल्ली में संगठन देख रहे थे।

केशुभाई पटेल मोदी को अपने लिए सबसे बड़ा ख़तरा मानकर इस जुगत में लगे थे कि वे गुजरात न आयें। लेकिन मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री की गद्दी पर भारी विरोध के बाद बैठे। आरएसएस की ओर से संजय जोशी सरीखे नेताओं ने भी उनका विरोध किया।

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तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और आउटलुक के संपादक विनोद मेहता के मध्य चाय पर जो बातचीत हुई उसे इस पुस्तक में पढ़ना रोचक है। सबा नक़वी पर वाजपेयी के तेवर हैरान करने वाले थे और ऐसा लगता था कि वे जैसे संपादक से कह रहे हों कि जो उनके खिलाफ लिखता है उसे वहाँ नहीं होना चाहिए। आउटलुक में 'वाजपेयी अकिलीज़ हील' (वाजपेयी की दुखती रग) शीर्षक से आलेख छपते ही मानो भूचाल आ गया। बाद में आउटलुक के मालिक, उनके दफ्तरों पर देश भर में आयकर छापे पड़े।

सबा लिखती हैं -'ऐसा कदापि नहीं समझा जाए कि आउटलुक रातों-रात भाजपा की पक्षधर पत्रिका बन गयी। हम बस खुद को जिलाये रखने की कोशिश में अपने काम से काम रख रहे थे।'

पुस्तक में वाजपेयी और नेहरु की तुलना करते हुए दिवंगत पत्रकार इन्दर मलहोत्रा के हवाले से कहा गया है -'देखा जाए तो वे (वाजपेयी) बेहतरीन वक्ता हैं लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी ऐसी एक वक्तृता नहीं जिसे याद रखा जा सके। परन्तु मुझे आज भी नेहरु के कितने सारे शानदार भाषण याद हैं जिन्हें वे खुद लिखा करते थे।' 

सबा लिखती हैं कि नेहरु न केवल अपने सैद्धान्तिक दूरदर्शिता पर अडिग रहते थे, उनको मूर्त रुप देने के लिए किसी भी हद से गुजर सकते थे। वाजपेयी का रवैया जैसाकि हमने राम मन्दिर मुद्दे पर देखा, अनिश्चितता से भरा होता है।

2004 के लोकसभा चुनाव में शिक्स्त खाने वाली भाजपा के कई बड़े नेताओं के बचकाने बयान आए। वेंकैया नायडू ने तिरुपति जाकर अपनी केशाहूति दी थी। उससे पहले उमा भारती 2003 में सर मुंडवा चुकी थीं। सोनिया के पीएम पद स्वीकारने पर सुषमा स्वराज सुर मुंडवाने और भुने चने खाने का प्रण कर चुकी थीं। लेखिका सबा नक़वी ने अरुण जेटली से कहा कि 'देश में प्रचलित बालकों की मुंडन प्रथा से प्रेरित हो लोग अब भाजपा को भारतीय मुंडन पार्टी का नाम दे रहे थे,वे बोले,'काश कि मेरी पार्टी के लोग यह समझ पाते कि आज का दौर 24/7 समाचार चैनलों का है।'
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लेखिका ने 2005 में आडवाणी की पाकिस्तान यात्रा का जिक्र किया है। आडवाणी ने वहां मोहम्मद अली जिन्ना को 'महान व्यक्तित्व' करार देते हुए उन्हें 'हिन्दू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा देने वाला' बताया। फिर क्या था, देशभर में बवंडर मच गया। वीएचपी ने तो आडवाणी को 'देशद्रोही' घोषित कर दिया था। बीजेपी के नेता शहनवाज़ हुसैन ने कहा कि जिन्ना किसी भी भारतीय मुसलमान के नायक नहीं हो सकते, वे हमेशा साम्प्रदायिक रहे, धर्मनिरपेक्ष कदापि नहीं। इसपर विनय कटियार जैसे फायरब्रांड नेता बोले -'जिन्नाह ने पहले देश विभाजित किया, अब दल विभाजित कर रहे हैं।'

आरएसएस के साथ लालकृष्ण आडवाणी के संबंध खराब हो गए। उधर भाजपा नेता जसवंत सिंह ने जिन्नाह पर किताब लिखी, 71 वर्षीय सिंह को उसके बाद पार्टी से बाहर निकाल दिया गया। गुजरात में कांग्रेस इकाई ने भाजपा को भारतीय जिन्नाह पार्टी तक कह डाला था।

अरुण जेटली को राष्ट्रीय राजनीति में लाने का श्रेय किसी भाजपा नेता को नहीं, वरन् पूर्व प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह को जाता है और यह बात हैरान करती है।
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भाजपा ने बाद में यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी जैसे दिग्गजों को भी पार्टी से अलग कर दिया। पुस्तक में प्रमोद महान के 'दुखद अंत' का भी विस्तार से वर्णन किया गया है। महाजन की उनके सगे भाई ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। महाजन के बेटे राहुल पर नशीली दवाओं सेवन का आरोप लगा और उन्हें हवालात में भी समय गुजारना पड़ा।

यह किताब भाजपा के बारे में, उसके भीतर चल रही गतिविधियों के बारे में, नरेन्द्र मोदी के आगाज़ और बाद के दिनों के बारे में हमें बहुत कुछ बताती है। सबा नक़वी ने अपने लंबे पत्रकारिता के अनुभव को इसमें उड़ेल दिया है। यह एक रोचक, जानकारीपरक, शानदार किताब है जिसे जरुर पढ़ा जाना चाहिए।

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