माटी मानुष चून : वेंटिलेटर पर ज़िन्दा एक महान नदी की कहानी

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आज से 55-60 साल बाद सरकार और समाज के गंगा को गुनने-बुनने की कथा है -'माटी मानुष चून'.
अनुपम भाई अक्सर कहा करते थे कि प्रकृति का अपना कैलेंडर होता है और कुछ सौ बरस में उसका एक पन्ना पलटता है। नदी को लेकर क्रान्ति एक भोली-भाली सोच है इससे ज़्यादा नहीं। वे कहते थे हम अपनी जीवनचर्या से धीरे-धीरे ही नदी को ख़त्म करते हैं और जीवनचर्या से धीरे-धीरे ही उसे बचा सकते हैं।

उनका 'प्रकृति का कैलेंडर' ही इस कथा का आधार बन सका है। नारों और वादों के स्वर्णयुग में जितनी बातें गंगा को लेकर कही जा रही हैं यदि वे सब लागू हो जायें तो क्या होगा? बस आज से 55-60 साल बाद सरकार और समाज के गंगा को गुनने-बुनने की कथा है -'माटी मानुष चून'।

बेशक सन् 2074 का समाज भी अलग होगा, संस्कृति भी बदले रुप में सामने होगी और तकनीक अपने उत्तर-आधुनिक स्वरुप में इनसान को वापस प्रकृति से जोड़ने का दावा कर रही होगी। ऐसे में जब गंगा पथ का समाज पानी की किल्लत, बाढ़ की विभीषिका, आर्सेनिक का कहर, मिट्टी कटाव और तेज़ी से बढ़ते डेल्टा का सामना कर रहा है। तब हमारे पास एक ऐसी गंगा है जिसमें सम्पन्न जलमार्ग और फूलों की खेती से अमीर हो चुके किसान हैं। भारत वाटर फुटप्रिंट का अहम खिलाड़ी बना हुआ है और फिशिंग का अर्थशास्त्र पूरी तरह बदल चुका है। शुद्ध गंगा जल बाज़ार में मौजूद है और पर्यावरणीय बदलावों के चलते कटाव ने एक बड़े इलाके को समुद्र बना दिया है। आज से आधी सदी बाद गंगा पथ के शहरों का कायापलट होकर वहाँ बुलेट ट्रेन चल रही होगी और उनके सीवेज को पूरी तरह ट्रीट करने में सफलता मिल चुकी होगी। गाद मैनेजमेंट एक बड़ी इंडस्ट्री होगी, इन सबसे बढ़कर स्वच्छता अभियान के अवैज्ञानिक परिणाम सामने आने लगेंगे। ये सभी विषय आशंकित करते हैं लेकिन अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं हैं।

कहते हैं मुँह से निकले शब्द कहीं नहीं जाते बल्कि यहीं, हमारी समझ से इतर विचरते रहते हैं, सोचिए यदि वे वापस आ गये तो! बटरफ्लाई इफ़ेक्ट से कैटरीना तूफ़ान लाने की आशंका पर विचार करने वाला विज्ञान उस कचरे के अन्तिम गन्तव्य पर बात क्यों नहीं करता जिसे सरकार नीले डिब्बे में डालने पर ज़ोर देती है। हर रोज़ पैदा किया जा रहा न मरने वाला कचरा कभी किसी रोज़, किसी रुप में तो सामने आयेगा ही।

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इसी तरह जड़ों से उखड़े या उखाड़े गये लोग भी वापस आते हैं, पीढ़ियों के बाद ही सही लेकिन आते हैं। और जब आते हैं तो अपने साथ एक तूफ़ान लेकर चलते हैं। गंगा पथ से उजाड़े गये लोग भी वापस आयेंगे कुछ सौ सालों बाद, तब क्या हमारे पास हिम्मत होगी उनका सामना करने की।

इस कहानी में भी साक्षी वापस आयी है, कई पीढ़ियों के बाद, अपनी जड़ों की तलाश में, कुछ सुनी-सुनायी कहानियों की बदौलत वह मिलना चाहती है अपनी ज़मीन से, अपने वजूद को ढूँढ़ खुद के अधूरेपन को पूरा करने की कोशिश करती है।

जो कचरा हम डस्टबिन में डाल कर देश को साफ़ कर रहे हैं वह अन्तिम रुप से जा कहाँ रहा है, इस पर तो बात ही नहीं हो रही।
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मेरा तकनीकी ज्ञान उतना ही है कि जितना मोबाइल चलाने के लिए ज़रुरी होता है। इसलिए इस कहानी को लिखते समय भविष्य में मौजूद तकनीक पर बात न के बराबर है। उस पर बात करने की कोशिश में कहानी के साइंस फ़िक्शन जैसा कुछ बनने का डर रहता और विषय से भटकने का भी। वास्तव में यह मेरी क्षमता के भी बाहर है।

-अ​भय मिश्रा.
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