बेचैनी से भरे रिश्तों के बीच रॉ-आईएसआई प्रमुखों के मध्य असंभव जैसी बातचीत

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किताब में ऐसे दो लोगों को साथ में पेश किया है, जिनमें हरेक अपनी-अपनी एजेंसियों के प्रमुख के तौर पर काम कर चुके हैं.
विख्यात लेखक और पत्रकार आदित्य सिन्हा ने रॉ के पूर्व प्रमुख ए.एस. दुलत और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई प्रमुख असद दुर्रानी से एक साथ भारत-पाकिस्तान के बीच चले आ रहे आपसी विवाद और दक्षिण एशिया को लम्बे समय से झकझोरने वाले टकराव पर बहुत ही गंभीर वार्ता की। इसमें बहुपक्षीय विचार-विमर्श करते हुए समस्याओं के कारण और निराकरण तक पहुँचने की कोशिश की।

इस वार्ता में कश्मीर और पाक में शांति के गंवाए मौके, हाफिज़ सईद और 26/11, कुलभूषण जाधव, सर्जिकल स्ट्राइक, ओसामा बिन लादेन संबंधी सौदेबाजी, भारत-पाक संबंधों में अमेरिका और रुस का प्रभाव और दोनों देशों की वार्ताओं की कोशिश को आतंकवाद कैसे विफल कर देता है आदि विषय शामिल हैं। वार्ता में दोनों देशों की खुफिया एजेंसियों के पूर्व प्रमुखों ने मीडिया की चिल्लपों को भी दोनों देशों के संबंध खराब करने की वजह माना है।

सही मायनों में यह पुस्तक पाठकों के लिए एक अलग तरह का अनुभव होगा जिसमें वे कई रहस्यों से पर्दा उठते हुए, गहरी पड़तालों के जंगल के बीच से गुज़रते हुए, गंभीर मसलों की जानकारी प्राप्त करते हुए आगे बढ़ते हैं। रोचक और शानदार ढंग से लिखी यह पुस्तक भारत-पाक खुफिया एजेंसियों के पीछे की कहानी को हमारे सामने लाती है।
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पुस्तक के लेखक आदित्य सिन्हा ने प्राक्कथन में पाठकों को संक्षेप में इसमें प्रकाशित सामग्री पर जरुरी जानकारी देने से पहले वार्ता में शामिल भारत-पाक  के पूर्व अधिकारियों तथा उनके कार्यक्षेत्र और सीमाओं का हवाला देते हुए लिखा है,'इस किताब में ऐसे दो लोगों को साथ में पेश किया गया है, जिनमें से हरेक अपनी-अपनी एजेंसियों के प्रमुख के तौर पर काम कर चुके हैं। उस रुप में ये लोग अपने-अपने देशों के बड़े रहस्यों के राज़दार रहे हैं -चाहे वे संवेदनशील विदेशी स्थानों पर गुप्त एजेंटों की तैनाती से संबंधित हों, या परमाणु हथियारों, सामरिक इंटलीजेंस से संबंधित हों, या फिर विदेशी एजेंसियों और सरकारों से गुप्त संबंधों से संबंधित हों। इनके पास अपने-अपने देशों के गुप्त रहस्य हैं।'

2016 में ए.एस. दुलत और असद दुर्रानी के बीच समान धरातल तलाशने के लिए वार्ताओं की श्रंखला चली। इनमें से एक रॉ के पूर्व प्रमुख थे, जो कि भारत की बाह्य खुफिया एजेंसी है और दूसरे थे इसके पाकिस्तानी समकक्ष आईएसआई के प्रमुख। चूंकि ये दोनों अपने देश में मुलाकात नहीं कर सकते थे, इसलिए पत्रकार आदित्य सिन्हा द्वारा निर्देशित यह बातचीत इस्तांबुल, बैंकॉक और काठमांडू जैसे शहरों में हुई।
 जब यह बातचीत पहली बार आरंभ हुई, जनरल दुर्रानी ने हंसते हुए कहा कि कोई भी इस पर भरोसा नहीं करेगा, भले ही इसे फिक्शन क्यों न मान लिया जाए। बेचैनी से भरे रिश्तों के बीच दो जासूसी एजेंसियों के पूर्व प्रमुखों के बीच हुई इस असंभव जैसी बातचीत से -जो कि अपनी तरह का पहला प्रयास है -कुछ सवालों के जवाब मिल सकते हैं।

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किताब में दुनिया की कई जानीमानी खुफिया एजेंसियां जैसे सीआईए, केजीबी, मोसाद आदि पर विस्तार से चर्चा की गयी है। ए.एस. दुलत मानते हैं कि सीआईए के आकलन हमेशा सही साबित नहीं हुए। इसके लिए उन्होंने फरवरी 1980 का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि चुनाव से पहले सीआईए को यकीन था कि बाबू जगजीवन राम अगले प्रधानमंत्री होंगे। लेकिन दुलत चार साल से भारत में नहीं थे, और उन्होंने फिर भी इंदिरा गांधी की वापसी की बात की जो सही साबित हुई। दुलत सीआईए के लिए कहते भी हैं,'वे अक्सर गलत घोड़े की सवारी करते हैं।'

जबकि इस्राइल की खुफिया एजेंसी मोसाद के बारे में दुलत का मानना है कि वह बहुत कड़े हैं और केवल अपने एजेंडे से मतलब रखते हैं।

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आईएसआई के पूर्व प्रमुख असद दुर्रानी ने कबूल किया है कि उन्होंने रॉ के एक पूर्व प्रमुख के साथ मिलकर संयुक्त आलेख लिखे और ओसामा बिन लादेन को मारे जाने के बारे में अपना आकलन ​भी दिया था जो सरकारी कथन के अनुरुप नहीं था।

कश्मीर के मुद्दे पर दोनों खुफिया एजेंसियों के प्रमुखों ने गहन चर्चा की है। अमरजीत सिंह दुलत कहते हैं कि कश्मीर के बारे में पूर्वानुमान लगा पाना मुश्किल काम है। वहां स्थिति रातों-रात बदल जाती है। उन्होंने बुराहान वानी की हत्या के बाद कश्मीर में बिगड़े हालातों का जिक्र करते हुए कहा कि कश्मीरी लोग पीड़ित और थके हैं और शांति चाहते हैं। ऐसे में पत्थरबाजी, विरोध-प्रदर्शन अनिश्चितकाल तक चल सकते हैं।

दुलत ने यह भी कहा कि दिल्ली से देखने पर ज़मीन पर स्थिति सामान्य लग सकती है, लेकिन कश्मीर में सब कुछ अच्छा नहीं।

आईएसआई के पूर्व चीफ दुर्रानी ने कहा कि अब चिंता यही है कि 2016 की घटनायें उसी तरह से होती हैं, जिस तरह से भारत चाहता है, तो क्या करना होगा। लेकिन उन्होंने कश्मीर को पुल बनाये जाने की बात को मुमकिन लगने वाला कहा। उनके मुताबिक दोनों देश लोगों को आराम का अहसास कराने के लिए काम कर सकते हैं।

इस पर दुलत कहते हैं,'अहम चीज़ यह है कि कश्मीरियों की नाक ज़मीन पर और ज़्यादा ना रगड़ी जाए, उन्हें हार का अहसास ना कराया जाए। ऐसे में ही कश्मीरी लोग पत्थरबाजी करना शुरु कर देते हैं। ....कश्मीरी अपनी सीमाएं अच्छी तरह समझते हैं और जानते हैं कि क्या व्यावहारिक है।'

हमारे देश के नवयुवकों को सरकार, उसकी सामरिक और खुफिया नीतियाँ तथा जनता के बीच अपनी बेहतर छवि प्रस्तुत करने के हथकंडों की जानकारी के लिए यह पुस्तक जरुर पढ़नी चाहिए। आज़ाद भारत और पाकिस्तान की अब तक की सरकारें भारत-पाक विवाद को क्यों नहीं सुलझा पायीं? इस तरह के कई सवालों के जवाब पुस्तक में पाठक जान सकता है।

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