‘भूत-खेला’ : किस्सों के भूत जो बहुत रोचक हैं

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‘भूत-खेला’ में भूत इंसानों के आसपास खेल रहे हैं या इंसानों से खेल रहे हैं, यह आप स्वयं पढ़कर जान पाएंगे.
ज़िन्दगी नए मोड़ों से घिरी है। हर पल नया, कुछ बेहद अलग होता है। हम उसे महसूस करें या न करें, लेकिन हर पल जुदा है। जीवन के रंगमंच पर हर किसी की एक कहानी है, हर कोई किसी किरदार में है और हर किरदार के साथ घटनाएँ घट रही हैं। गीताश्री ज़िन्दगी के रहस्य से भरे हिस्सों को गूँथकर ऐसा कुछ पन्नों पर उकेर चुकी हैं, जिसे पढ़ना रोचक है। पढ़कर अच्छा लगता है, बीच-बीच में ‘भूत’ मिलते हैं। यहीं से मन उत्सुक होता है। कहानी में खोकर, गीताश्री के सफर के साथी होकर, भूतों से थोड़ी बहुत जान-पहचान कर हम चलते रहते हैं। पता नहीं कब किताब खत्म हो जाती है!

‘भूत-खेला’ नाम है उस कहानी संग्रह का है जिसमें हर कहानी में आपको ऐसे भूत मिल जाएँगे जिनसे आपको डर भी लग सकता है। मगर विचलित होने की बात नहीं है, कहानी के आखिर में उसका भी इंतज़ाम किया है लेखिका ने। ये भूत ऐसे हैं जो किसी वजह से हैं, और वह वजह पढ़कर चौंकना बनता है। गीताश्री भूतों, आत्माओं को नींद से जगाना चाहती हैं। वे स्वयं कहती हैं,‘जब जब शमशान, कब्रिस्तान से गुज़रती हूँ, आवाज़ देती हूँ। कितनी गहरी नींद में सो गये वे लोग, ज़िन्दा भूतों की आवाज़ सुनते ही नहीं।’

गीताश्री इन भूतों को किस्सों के भूत मानती हैं। मगर ये हैं बड़े रोचक!

वाणी प्रकाशन के उपक्रम नाइन बुक्स ने गीताश्री के कहानी संग्रह ‘भूत-खेला’ का प्रकाशन किया है। इसमें कुल नौ कहानियाँ हैं, जो कई पाठकों के रोंगटे भी खड़े कर सकती हैं।
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‘उस पार न जाने क्या होगा’ शीर्षक वाली कहानी में उस बुढ़िया का चरित्र बेहद मज़ेदार है। वह ओर किसी को नहीं दिखायी देती सिवाय एक आदमी को। वह उसे नदी पार करने से पहले सहारा देकर नाव पर रोज चढ़ाता है, लेकिन उस दिन ऐसा कुछ हुआ कि उसकी ज़िन्दगी हमेशा के लिए बदल गयी। उसे किसी ने बेहोशी की हालत में नदी से खींचकर बचाया। क्या वह बुढ़िया थी, जो किसी को नहीं दिखती? क्या वह भूत है? उस आदमी ने एक ऐसे झोपड़े में खुद को पाया जिसे लोग ‘भूतिया’ कहते थे। वह फ्लैशबैक में भी गया जहाँ उसे ट्रेन में चढ़ते समय ‘बचाओ बचाओ’ की आवाज सुनी थी। कई घटनाओं का कनैक्शन जुड़कर यह कहानी बनती है बेहद दिलचस्प।

इस कहानी के आखिर में देखें,‘मुझे एक साल पहले की स्टेशन से लेकर कल रात तक की सारी घटनाएँ फिर से याद आ हो आयीं। मैं वहाँ से भागा लेकिन अगर कोई देख सकता तो देख पाता कि मेरे पीछे तीन जोड़ी पैर और भाग रहे थे! अब वे हमेशा मेरे साथ रहने वाले थे!’

असल में गीताश्री की कहानियाँ हमसे कुछ कहना चाहती हैं। हर कहानी नये ट्विस्ट के साथ आती है, और हमें हैरान कर जाती है। 

‘वह अनजान औरत’ कहानी के आखिर में पढ़ें -
‘अम्मा, मौत भी ज़िन्दगी देती है क्या?’
सिहरती हुई अम्मा बोलीं, ‘भूत देख लियो है का बचवा!’

इस कहानी में दूसरी जगह देखें -
‘ये ज़िन्दगी जीने के लिए होती है, रोने के लिए नहीं! अपने सपने पूरे करने के लिए हमें जीना होता है। मौत कदम-कदम पर हमारे सामने खड़ी होती है, हमें नहीं पता कि हमारा आने वाला कल क्या हो! इसलिए आज में जियो!’

गीताश्री की कहानियाँ जीवन की सच्चाई से भी रुबरु कराती रहती हैं। यहाँ ऐसा माहौल बनाया गया है कि पाठक किताब को पूरी पढ़कर ही हटेगा। उससे भी अच्छी बात यह कि इन कहानियों को लंबे समय तक अपनी याद से नहीं निकाल पायेंगे। 
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‘कुएँ का रहस्य’ में सजी हुई दुलहन और उसका रहस्य पढ़ने लायक है। जब कुएँ से आवाज़ें आती हैं, और....
‘सुबह हवेली के लोगों ने जो देखा, उनकी आँखें फटी-की-फटी रह गयीं। कुएँ के बाहर अम्बा की चप्पल और कपड़े पड़े थे....।’

पहले वह एक थी, अब वे दो हो गयीं। पूरे श्रंगार के साथ आदमियों के शिकार पर निकलतीं। यह कहानी भी सस्पेंस से भरी है।

यदि आपको हॉस्टल में रहने वाले अमित को बुरी तरह ख़ौफ़ज़दा देखना है तो इस संग्रह की कहानी ‘कहीं ये वह तो नहीं!’ पढ़िए, जैसे-जैसे वह डर कर भागेगा, फिर रुकेगा, कोई मिलेगा, मगर फिर कुछ ऐसा होगा कि उसका डर पहले से ज्यादा बढ़ जाएगा। आप उसे करीब से देख रहे होंगे। वह इसी तरह दौड़ता-भागता-ठहरता रहेगा। आखिर में वह हॉस्टल के गेट पर पड़ा हुआ मिला। मगर वहाँ भी वही ‘कटे हाथ’ मिलते हैं।

‘भूत-खेला’ में भूत इंसानों के आसपास खेल रहे हैं या इंसानों से खेल रहे हैं, यह आप स्वयं पढ़कर जान पाएंगे।संग्रह की हर कहानी पर खुलकर चर्चा की जा सकती है, लेकिन सस्पेंस बना रहना चाहिए। इसलिए पाठक स्वयं पूरा संग्रह पढ़ें और भूतों से रुबरु होकर अलग अनुभव प्राप्त करें!

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