#Kashmir : कश्मीर के हालात की तह तक पड़ताल

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राजनीति किस तरह वहां हवाओं का रुख बदल रही है -यह गंभीरता से सोचने वाली बात है.
हुमरा कुरैशी ने कश्मीर की धड़कन को बेहद करीब से जाना है। 1990 से वह कश्मीर पर लिख रही हैं, वहाँ की मिट्टी से वाकिफ़ हैं और बाशिंदों की ज़िन्दगी कैसी गुज़र रही है, यह भी बखूबी जानती हैं। हुमरा ने अपनी नई किताब में कश्मीर के हालात की तह तक पड़ताल की है। तब से अबतक क्या तब्दील हुआ, हो रहा है, तथा भविष्य में कैसे हालात हो सकते हैं, इस पर नज़रिया पेश किया है।

'Kashmir : The Unending Story' का प्रकाशन मंजुल पब्लिशिंग हाउस के उपक्रम Amaryllis ने किया है। हुमरा कुरैशी ने कई किताबें लिखी हैं।

इस पुस्तक में हुमरा कुरैशी ने कश्मीर के बनते-बिगड़ते हालातों का सिलसिलेवार वर्णन किया है। वह लिखती हैं कि कश्मीर के निवासी हर समय संगीनों के साए में रहते हैं। यह दुनिया के उन क्षेत्रों में आता है जहाँ फौज बारह महीने गश्त करती है। जहाँ कभी भी कर्फ्यू लग सकता है। जहाँ पत्थरबाजी होती है। जहाँ पैलेट-गन लोगों को जख़्मी करती है। जहाँ एनकांउटर होते हैं और आम लोगों के भी गोली से मारे जाने के समाचार मिलते हैं।

जुलाई 2016 की वह घटना जिसने कश्मीर को बुरी तरह सुलगा दिया था, जब 22 साल के हिजबुज मुजाहिदिन के कमांडर बुरहान बानी के जनाजे में भीड़ उमड़ी और उसपर पैलेट और बुलट दागे गए। इस दौरान कई लोग मारे भी गए और बहुत-से घायल हुए।

हालांकि कश्मीर में हालात ज्यादा खराब होने की मुख्य वजह राजनीति है। जम्मू-कश्मीर में पीडीपी और भाजपा ने मिलकर सरकार का गठन किया था। विचाराधारा की बात की जाए तो दोनों पार्टियाँ एक-दूसरे से बिल्कुल जुदा हैं। इस बेमेल-गठबंधन का हश्र क्या हुआ सभी जानते हैं। 2018 की गर्मियों में यह बिखर गया। लेकिन इससे कश्मीर के हालात और खराब हो गए।
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किताब बताती है कि कश्मीर में मीडिया की आवाज़ को दबाया जाता रहा है। इंटरनेट की स्थिति क्या है इससे हर कोई परिचित है। पत्रकारों को कवरेज से रोका गया, समाचार-पत्रों की प्रतियां जब्त हुईं और न जाने क्या-क्या!

इस पुस्तक के जरिए हुमरा कुरैशी सवाल उठाती हैं कि क्या हम अपने नागरिकों के खिलाफ जंग लड़ रहे हैं? क्या हम जानना चाहते हैं कि कश्मीर में विद्रोह की आवाज़ें क्यों उठ रही हैं? क्यों कश्मीरी राजनीतिक खेल का शिकार हो रहे हैं? इनके अलावा भी हुमरा कई सवाल उठाती हैं।

कश्मीर में बिगड़ी फिज़ा का सबसे अधिक खामियाज़ा किशोरों और युवाओं को भुगतना पड़ रहा है। वे अपने भविष्य को लेकर शंकित हैं।

हुमरा कुरैशी ने इस पुस्तक में कश्मीर की रुह को छूने की कोशिश की है। यह जानना चाहा है कि आम कश्मीरी की ख्वाहिश क्या है? राजनीति किस तरह वहां हवाओं का रुख बदल रही है -यह गंभीरता से सोचने वाली बात है।
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साल 2008 में पीडीपी-कांग्रेस गठबंधन टूटा, तब भी हालात बिगड़ते गए। अशांत माहौल ने कश्मीर को फिर से घेर लिया। हुमरा लिखती हैं कि एक कश्मीरी की ज़िन्दगी 2014 से बेहद कठिन हुई। इसका मुख्य कारण कश्मीर में आयी भीषण बाढ़ तथा राजनीति। पीडीपी-भाजपा गठबंधन का विरोध घाटी को अशांत कर ​गया।

यह किताब हमें उन सच्चाईयों से रुबरु कराती है जो हमें बताती हैं कि कश्मीर में ऐसे हालात क्यों बने? लेखिका ने विभिन्न स्रोतों का हवाला देकर अपनी बात को पुष्ट किया है। उन्होंने लोगों से जमीन पर जाकर चर्चा की है। उन परिवारों का हाल जाना है जो अपनों को खो चुके। उन्होंने नेताओं के साक्षात्कार कई साल के बीच किए हैं। इससे हमें बदलते मौसम का काफी पता चलता है। हुमरा कुरैशी ने यासीन मलिक, अब्दुल गनी लोग, नोएम चोमस्की, महबूबा मुफ्ती, सैफुद्दीन सोज, म़ुफ्ती मोहम्मद सईद आदि नेताओं से बातचीत की जिसे इस पुस्तक में पढ़ना दिलचस्प है।

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