खोजबीन का आनन्द : पढ़ाई को आसान करने के तरीके बताने वाली किताब

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यह किताब कक्षाओं के स्वरुप व उनमें ​सीखने-सिखाने की रचना को लेकर एक अलग दृष्टि देती है.
'खोजबीन का आनन्द' किताब वास्तव में हमें सिखाती है कि 'पढ़ाते कैसे हैं?' लेखक कालू राम शर्मा ने कुछ पात्रों के माध्यम से यहाँ घटनाओं को खूबसूरत अंदाज़ में बुना है। हम स्कूल के दिनों में छात्र-छात्राओं के बीच होते हैं। उनके मज़ेदार सफर के भागी होते हैं। मास्साब हमें सिखाते हैं कि चीज़ों को समझा कैसे जाता है। वे हमें विज्ञान की बारीकियों को रोचक ढंग से बताते हैं। उनके पास कोई जादू की छड़ी नहीं, बल्कि वे तो हमारी पढ़ाई को मज़ेदार और बोरीयत भरी होने से बचाने के उपाय करते हैं। ऐसे मास्साब यदि हर किसी क्लास में हों तो वह दिन दूर नहीं जब खेल-खेल में पढ़ाई होगी।

लेखक कालू राम शर्मा ​पुस्तक की भूमिका में बताते हैं -'बच्चों के अपने आसपास के पर्यावरण और उनके परिवेश से जोड़कर माध्यमिक कक्षाओं में 'करके सीखने' पर आधारित विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम की नींव रखी होशंगाबाद जिले में कार्य कर रही स्वैच्छिक संस्थाओं -किशोर भारती और मित्र मण्डल केन्द्र रसूलिया ने।'

'होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम या होविशिका ने बच्चों के सीखने-सिखाने को लेकर प्रचलित मान्यताओं को रद्द किया और नए सिरे से जान फूंकी।'

इसके अंतर्गत 'बाल वैज्ञानिक' नाम से किताबें तैयार की गयीं। सन् 1972 में शुरु हुआ यह कार्यक्रम काफी कारगर साबित हुआ। शिक्षा को नए आयाम मिले, छात्र-शिक्षक के मध्य संवाद की नयी इबारत लिखी गयी और सीखने-समझने में वृद्धि हुई। मगर इस कार्यक्रम को मध्य प्रदेश सरकार ने 2002 में बंद कर दिया जिसे ​'शिक्षा के इतिहास की सबसे निर्मम घटना' कहना गलत नहीं होगा।

मास्साब सोच रहे थे कि बच्चों की जिज्ञासा को शान्त नहीं करना है। दरअसल बच्चों की सोचने की भूख को और बढ़ाना है।
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अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय से जुड़े हृदयकांत दीवान के मुताबिक 'यह किताब न केवल विज्ञान शिक्षण बल्कि स्कूली शिक्षा में कक्षाओं के स्वरुप व उनमें ​सीखने-सिखाने की रचना को लेकर एक अलग दृष्टि देती है। वही सिखाता है जो साथ-साथ कुछ सीख भी रहा है। विज्ञान की कक्षा कैसी हो, यह पहलू इन कहानियों में स्पष्ट तौर पर झलकता है। कहानियां न सिर्फ कक्षा के भौतिक स्वरुप, किट, कक्षा में बैठक-व्यवस्था, समयावधि से जुड़ी हैं पर वह कक्षा-प्रक्रिया के बारे में ज्यादा हैं।'

'खोजबीन का आनन्द' किताब शिक्षा, शिक्षक और छात्रों के संबंधों को भी बयान करती है। मास्साब कक्षा में बच्चों को नये-नये प्रयोग करवाते हैं। इसके लिए उन्हें उत्साहित किया जाता है। जब खुशी-खुशी सीखा जाता है तो उसके परिणाम सुखद आते हैं। यही इस पुस्तक की कक्षाओं में होता है। शिक्षक खेल-खेल में पाठ सिखाते हैं। बच्चे बड़ी आसानी से उसे सीख भी लेते हैं। कहने का मतलब है कि बच्चों को शिक्षा बोझ की तरह नहीं बल्कि मजेदार और रोचकता के साथ दी जाए तो भविष्य के लिए मजबूत नींव तैयार होगी।
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शिक्षकों को समय-समय पर अपने स्तर से पढ़ने के तरीके ईजाद करने की जरुरत है। ऐसा माहौल बनाया जाए कि पढ़ाई बेहद सरल लगे और उत्सकुता जगाने वाले प्रयोग किए जाते रहें। यह विज्ञान ही नहीं बल्कि हर विषय की पेचीदगी को कम कर देगा और एक शानदार शिक्षा प्रणाली की ओर हमें ले जाएगा। इससे आने वाली पी​ढ़ी प्रभावित होगी।

वाकई बहुत बेहतरीन तरीके से यह किताब लिखी गयी है। इसे हर छात्र-छात्रा को एक बार जरुर पढ़ना चाहिए। और शिक्षकों को भी!
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