रूह की प्यास : ख़ौफ और रहस्य के बीच 'लस्टी-तड़का'

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हमारे लिए खुशख़बरी है कि खौफ़, रहस्य और जिस्म की कहानियाँ पुराने अंदाज़ से बाहर आ चुकी हैं.
कहानियाँ ज़िन्दगी के किस्से होते हैं,
कुछ पके-अधपके हिस्से होते हैं।

जब इन कहानियों में थोड़ा रोमांच और 'लस्टी-तड़का' लगा दिया जाए, और ऐसा माहौल पैदा किया जाए जिससे एक अलग लेवल बनने की प्रक्रिया का आरंभ हो तो वह अनुभव मजेदार है।

जयंती रंगनाथन का एक कहानी संग्रह आया है -'रूह की प्यास'। इसका शीर्षक इस संग्रह की कहानियों पर सटीक है। वाणी प्रकाशन के उपक्रम नाइन बुक्स ने इस पुस्तक को प्रकाशित किया है।

सभी कहानियाँ इस तरह बुनी गयी हैं कि उत्सुकता जागनी आखिरी पंक्ति तक थमती नहीं। जब हम पहली कहानी पढ़ते हैं, तो दूसरी कहानी खुद शुरू हो जाती है। इसी तरह सभी कहानियाँ पढ़ जाते हैं। किताब कोई भारी -भरकम नहीं, 100 के करीब पन्ने हैं। एक सिटिंग में पूरी पुस्तक पढ़ी जा सकती है।

अब आते हैं पहली कहानी पर जिसका शीर्षक है -'रिज़ॉर्ट के जानवर'। यह उत्सुकता जगाता है कि कहानी में क्या ख़ास है। मौली इस कहानी की मुख्य किरदार है। सारा खेल उसके आसपास रचा गया है। उसकी मुलाकात एक ऐसे शख्स से होती है जिसकी वह दीवानी हो जाती है। ऐसी दीवानगी छा जाती है कि वह उसके साथ अंतरंग पलों का आनंद लेती है। उन पलों का चित्र जयंती रंगनाथन ने शानदार तरीके सें खींचा है। लेखिका ने वहाँ 'वहशीपन' का ज़िक्र किया है जो कहानी में बाद में पाठक को ताज्जुब में डाल देता है। जब कहानी ख़त्म होती है तो...

'इतना शोर क्यो हो रहा है डैन?'

'कुछ नहीं... पता नहीं कैसे रिज़ॉर्ट में एक सियार घुस आया है। बस उसे खदेड़ रहे हैं...'

यह हमें सन्न कर देता है, और बेचैन भी। जयंती रंगनाथन की सभी कहानियों में जो ट्विस्ट आते हैं वे बेहतरीन रंग दिखाते हैं। हर कहानी का अपना अलग रंग, अलग फ्लेवर है।

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'...खुशबुओं के गाँव में' कहानी सिड और उन खूबसूरत महिलाओं के आसपास बहती है। किस तरह कार का खराब होना, महिलाओं को स्टेशन तक ले जाना, फिर वापस उन्हें अपने गेस्ट हाउस ले आना, और फिर...

'वह तो बस रसरंग की ऐसी दुनिया में डूबा जा रहा था, जहाँ इससे पहले कभी नहीं गया था। निखत की कमसिन-सी देहदृष्टि में इतनी लचक होगी, सोचा न था। वह माहिर थी अपने पेशे में।'

इस कहानी में वीरभद्र सेठ की हवेली और उनके बेटे का ज़िक्र आपको फिर से सन्न कर देगा।

परदे के दूसरी तरफ एक अलग ही दुनिया है, इतनी नयी और रोमांच से भरपूर कि उसे छूने और उसके पीछे भागने का मन करता है। इस दुनिया में सही या गलत कुछ भी नहीं है, जो है वो है आपकी सोच और दुनिया को देखने का अंदाज़। इस तरह रंग, रोमांच, रुह और जिस्म की सिलवटों को बुनते-रचते हुए कुछ किरदार निकले और कुछ कहानियाँ।
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तीसरी कहानी 'गलियाँ यहाँ ख़त्म नहीं होतीं' भी रोचक है। इसी तरह 'चमेलीगढ़ की देवी', 'नींद के गाँव में' और 'दर्द ने सिर उठाया, तो दुहाई माँगोगे' भी पठनीय हैं। लेखिका ने सभी कहानियों में पाठकों को बोझिल महसूस नहीं होने दिया। जगह-जगह 'लस्टी-तड़का' लगा दिया गया है। हालांकि इससे कहानी का रंग कहीं फीका नहीं पड़ा, बल्कि वह उभरकर आया है। इस संग्रह की किसी भी कहानी में कामुकता फूहड़ता की शक्ल नहीं लेती। लेखिका ने बेहद सलीके से और अच्छी सोच से अपनी कलम चलायी है। यही वजह है कि जयंती रंगनाथन की हर कहानी निखरती हुई सामने आती है। जगह-जगह डर और रहस्य का माहौल बनता है। कई बार तो अकेले में कहानी पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे हमारे आसपास कोई है।

हमारे लिए खुशख़बरी है कि खौफ़, रहस्य और जिस्म की कहानियाँ पुराने अंदाज़ से बाहर आ चुकी हैं। पाठकों को यदि इन दिनों कुछ अलग पढ़ना है तो उन्हें जयंती रंगनाथन की पुस्तक 'रुह की प्यास' पढ़नी चाहिए।

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