अर्जुन: पांडव योद्धा की गाथा

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अनुजा चन्द्रामौली की पुस्तक पांडव योद्धा अर्जुन की कहानी है जो संसार के सर्वश्रेष्ठ योद्धा के रुप में जाना जाता है.
हिन्दी में अनुजा चन्द्रामौली को यदि आपने नहीं पढ़ा, तो ‘अर्जुन’ एक अच्छी शुरुआत हो सकती है। इसपर अनुवाद करने वाले आशुतोष गर्ग हों तो क्या कहने। यह आशुतोष की किताब भी हो जाती है। अनुजा पौराणिक गाथाओं को रोचकता के साथ लिखने में माहिर हैं। पुस्तक का प्रकाशन मंजुल पब्लिशिंग हाउस ने किया है। कवर डिजाइन प्रियंका हर्दिकर ने किया है जो बेहद सुन्दर है।

इस पुस्तक में अर्जुन की कथा का विस्तार से वर्णन किया गया है। लेखिका ने विवरणों को इस प्रकार प्रस्तुत किया है कि वह सजीव लगते हैं। किताब पढ़ते हुए अहसास होता है कि सबकुछ जैसे हमारी आंखों के सामने चल रहा हो।

‘यह कथा अर्जुन के प्रेम, उसकी मित्रता, अभिलाषाओं, दुर्बलताओं, गलतियों, उसकी असामयिक मृत्यु तथा नपुंसक-रुप में कुछ दिन के जीवन एवं उसके हृदय के अंतरतम विचारों को अत्यंत भावुकता से प्रस्तुत करती है। महाभारत की जबरदस्त पृष्ठभूमि में आधुनिक और विनोदी शैली में लिखी गई ‘अर्जुन’ हर वर्ग के पाठक को आकर्षित करती है। इस पुस्तक में अर्जुन के जन्म से पूर्व से लेकर उसके संपूर्ण जीवन की महागाथा विस्तृत ढंग से प्रस्तुत की गई है।’

कहानी अर्जुन के जन्म से शुरु होती है। ‘अर्जुन की कथा’ अध्याय में पांडु के शाप के बारे में हमें पता चलता है। पांडु के साथ आखेट के दौरान ऐसी घटना घटी जिसने उनकी ज़िन्दगी हमेशा के लिए बदल दी। उनकी क्या, उनके पूरे परिवार पर काले बादल मंडरा गए। पांडु ने एक हिरण को तीर से घायल कर दिया। वह एक ऋषि पुत्र था जो रूप बदलकर हिरण के वेश में रति-क्रिया कर रहा था।

उसने मृत्यु के अंतिम क्षणों में पांडु को ऐसा शाप दिया कि वह बुरी तरह घबरा गया। उसने शाप देते हुए कहा,‘दुष्ट! तूने एक निर्दोष प्राणी के अनुचित क्षण में प्राण लिए हैं। तू भी इसी तरह अपनी पत्नी के साथ रति-क्रिया करता हुआ मारा जाएगा।’

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पांडु द्वारा खूब विनती करने के बाद भी ऋषि-पुत्र टस से मस नहीं हुआ। पांडु इतना दुखी हुआ कि उसने राज्य त्याग दिया और वनवास को चला गया। उसकी दोनों पत्नियाँ - कुंती और माद्री भी उसके साथ वन चली गयीं। वहाँ उन्होंने एक साल तक कड़ी तस्पया कर इंद्र को प्रसन्न कर लिया। इंद्र से उन्हें अर्जुन की प्राप्ति हुई।

‘कुंती ने जब अपने वीर और विलक्षण पुत्र को बाहों में लिया तो आकाश से दिव्य स्वर गूँजने लगे, जिन्हें सुनकर पता लग रहा था कि अर्जुन, भविष्य में महान कार्य करने वाला था। उसी समय आकाश से पुष्प-वर्षा भी होने लगी।’

पांडु के पाँच पुत्र हुए जिनके नाम थे -युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव।

‘यह नियत था कि उनमें अर्जुन सबसे अधिक योग्य और पराक्रमी होगा, जो अपनी अद्वितीय धनुर्विद्या से पूरे संसार को जीतकर उसे अपने भाइयों के चरणों में रख देगा। इसके अतिरिक्त, अर्जुन का निष्ठावान मित्र, स्नेही भाई, प्रेमपूर्ण पति, अच्छा पिता, योग्य नपुंसक और शक्तिशाली तपस्वी के रुप में ख्याति प्राप्त करना भी पूर्व-निर्दिष्ट था।’

जब हम दूसरे अध्याय में आते हैं तो पाते हैं कि पांडु की मृत्यु हो जाती है। वह अपनी छोटी पत्नी माद्री की बाँहों में प्राण त्याग देता है। माद्री स्वयं को पति की मृत्यु का कारण मानकर पांडु के साथ सती हो जाती है।

कुंती पाँच पुत्रों के साथ हस्तिनापुर लौट आती है। वहाँ कौरवों और पांडवों के बीच कटुता पनपने लगी थी। कृपाचार्य से अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा ग्रहण करने के बाद अर्जुन ने द्रोणाचार्य से शिक्षा प्राप्त की। अनुजा लिखती हैं -‘अर्जुन के जीवन में द्रोणाचार्य का आगमन दोनों के लिए ही अत्यंत महत्वपूर्ण समय पर हुआ। अर्जुन को एक योग्य गुरु की तलाश थी, जो उनके भीतर की तीव्र अभिलाषा एवं योग्यता को पहचान उसे एक ऐसा कुशल व अजेय योद्धा बना सके, जो अकेला ही अपने भाइयों के उद्देश्य की पूर्ति के लिए पर्याप्त हो और साथ ही, स्वयं भी अद्भुत कारनामों से अमर हो जाए। दूसरी और, द्रोण को भी ऐसे योग्य शिष्यों की आवश्यकता थी, जो अपने गुरु पर हुए अत्याचार का प्रतिशोध ले सकें।’

पुस्तक में अर्जुन के द्रोण से शिक्षा ग्रहण करने के समय के रोचक किस्से भी दर्ज हैं। मसलन जब उसने एक मगरमच्छ का मुख तीरों से बींध दिया था जब गंगा नदी में नहाते समय द्रोण का पैर मगरमच्छ ने पकड़ लिया था।

एकलव्य के बिना द्रोण और अर्जुन का जिक्र अधूरा है। इसलिए अनुजा ने निषाद जाति के मुखिया हिरण्यधनु के पुत्र एकलव्य के बारे में एक अध्याय में लिखा है। एकलव्य ने कौरवों के कुत्ते के भौंकने पर उसका मुँह सात वाणों से बींध दिया था। गुरु का नाम पूछने पर उसने द्रोण का नाम लिया तो अर्जुन को इससे गहरा धक्का लगा। उसने गुरु द्रोण से पूछा, ‘आपने मेरे साथ विश्वासघात क्यों किया?’ द्रोण ने चालाकी दिखाते हुए गुरु दक्षिणा में एकलव्य से उसका अँगूठा माँग लिया जिसे खुशी-खुशी उसने काटकर समर्पित किया।

लेकिन .....

‘अपना अँगूठा गँवा देने के बाद एकलव्य के मन में अर्जुन के प्रति पहले जैसे श्रद्धा नहीं रही। उसने निश्चय किया कि वह एक दिन अवश्य द्रोण के समक्ष सिद्ध करेगा कि उसकी तुलना में अर्जुन अयोग्य शिष्य है। उसने यह भी संकल्प किया कि वह द्रोण का आशीर्वाद लेकर अर्जुन को मार डालेगा।’
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पुस्तक हमें कर्ण के विषय में भी बताती है जो कुंती का ही पुत्र था, लेकिन उसका जन्म कुंती के विवाह से पहले सूर्य देवता से हुआ था। कर्ण को उत्पन्न करते ही उसे एक टोकरी में रखकर बहा दिया गया जिसे एक निंसंतान सारथी दंपत्ति ने अपना लिया। कर्ण ने ब्राह्मण का वेश धारण कर परशुराम जैसे ऋषि-योद्धा से शिक्षा ली। बाद में कर्ण की असलियत जानने पर परशुराम ने उसे शाप दे दिया। उसी तरह कर्ण से एक ब्राह्मण की गाय की मौत हो गई तो उसने भी उसे शाप दिया।

‘इस तरह परिस्थितियाँ कर्ण के नियंत्रण से बाहर हो गईं और उन्होंने उसका भविष्य निर्धारित कर दिया। ....दुर्योधन के मित्र एवं शत्रु, कर्ण के भी मित्र एवं शत्रु बन गए। ....अर्जुन के प्रति कर्ण के मन में द्वेष और घृणा का भाव जाग्रत हो गया तथा उसका वैमनस्य बढ़ता गया।’

अनुजा चन्द्रामौली ने कौरव और पांडवों के साथ हुईं घटनाओं को बेहद तरीके से समेटा है। उन्होंने रोचक ढंग से घटनाओं को हमारे सामने प्रस्तुत किया है कि उन्हें पढ़ते हुए आनंद आता है।

चाहें वह लाक्षागृह में पांडवों को दुर्योधन द्वारा जलाकर मारने का षड़यंत्र हो, द्रोपदी की बात हो या नागलोक की राजकुमारी की चर्चा, या युद्ध के विवरण -यह पुस्तक हमें महाभारत काल की हर घटना का उल्लेख करती है। साथ ही कृष्ण के कारण जिस तरह अर्जुन ने युद्ध लड़ा उसे पढ़ना बेहद रोचक है।

कृष्ण को अपनी ओर करने के लिए अर्जुन और दुर्योधन दोनों एक समय पर उनके पास पहुँचे थे। कृष्ण ने अपनी यादव सेना का सहयोग दुर्योधन को दिया तो स्वयं अर्जुन के सारथी की भूमिका निभाई। कुरुक्षेत्र का युद्ध इतना वीभत्स था कि उसने परिवारों को समाप्त कर दिया। अर्जुन एक नायक के रुप में उभरा।

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अनुजा चन्द्रामौली की पुस्तक ‘अर्जुन’ हमें कृष्ण की अंतिम यात्रा के बारे में भी बताती है। भीषण नरसंहार के बाद यादव कुल खत्म हो रहा था। वे अपने बड़े भाई बलराम की खोज में निकल पड़े। कृष्ण ने देखा कि एक सफेद साँप बलराम के मुँह से बाहर निकला। लेखिका लिखती हैं-‘...तो कृष्ण समझ गए कि बलराम भी इस मृत्युलोक को छोड़ गए थे।’

जब कृष्ण वन में एक वृक्ष के नीचे बैठे तो उनका एक पैर बाहर निकला हुआ था। जर नामक शिकारी ने जब दूर से कृष्ण का गुलाबी पैर देखा, तो उसे लगा कोई पशु है। उसने मछली के पेट से निकली लोहे की नोक से तैयार बाण उसी समय छोड़ दिया। बाण कृष्ण के पैर में लगा। शिकारी ने गलती का अहसास होने पर रोते हुए कृष्ण से माफी माँगी। इसपर लेखिका चन्द्रामौली लिखती हैं -‘कृष्ण उसे देखकर मुस्कराए और बोले कि जर ने उन्हें मृत्युलोक से मुक्ति दिलाकर बहुत उपकार किया है। कृष्ण ने जर को आशीर्वाद दिया और फिर आँखें बंद कर लीं। उनकी आत्मा, उनके शरीर से मुक्त होकर वैकुंठ लोक में भगवान विष्णु में लीन हो गई।’

गांधारी का शाप सच हो गया था।

उपन्यास में कुटिल चालें, ईर्ष्या, प्रेम, क्रोध, आदि का एक शानदार मिश्रण तैयार किया गया है, जिसे पढ़ना एक जबरदस्त अनुभव है। वैसे भी महाभारत की कहानी इतनी सारी छोटी-बड़ी घटनाओं का संगम है कि उसे बार-बार पढ़ने का मन करता है। अनुजा चन्द्रामौली ने अर्जुन के ईदगिर्द घटने वाली घटनाओं को जोड़कर यह उपन्यास लिखा है।

पुस्तक के आखिर में अनुजा चन्द्रामौली ने यह वर्णन किया है -
‘अंत में अर्जुन अपने बारे में केवल इतना कह सकता था कि वह संसार का सर्वश्रेष्ठ योद्धा था और सदा रहेगा। अर्जुन, हिमालय पर्वत से जब नीचे गिरा, तो यही एक विचार उसके साथ था। उसकी आत्मा, शरीर से मुक्त हो गई और स्वर्ग चली गई, जहाँ कृष्ण, अभिमन्यु और उसके अन्य प्रियजन उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे।’

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