सुनता है गुरु ज्ञानी : शीर्षस्थ संगीतज्ञों से संवाद

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'सुनता है गुरु ज्ञानी' पुस्तक में शास्त्रीय संगीत के ग्यारह सुप्रसिद्ध विद्वानों के साक्षात्कार संकलित हैं.
भारत ही नहीं विश्व के शीर्षस्थ संगीतज्ञों से संवाद पर आधारित एक बहुमूल्य पुस्तक ‘सुनता है गुरु ज्ञानी’ मंजुल प्रकाशन ने प्रकाशित की है। इस पुस्तक को ध्रुपद गायन पुरोधा उमाकान्त, रमाकान्त तथा अखिलेश गुन्देचा ने तैयार किया है। यह पुस्तक एक दिलचस्प किताब है।

पुस्तक में शास्त्रीय संगीत के ग्यारह सुप्रसिद्ध विद्वानों के साक्षात्कार संकलित हैं। गुन्देचा बंधुओं ने इन संगीतकारों से शास्त्रीय संगीत और वाद्य यंत्रों पर महत्वपूर्ण सवाल किए हैं जिनके उत्तर उन्होंने सहर्ष दिए हैं। उनके जवाब संगीत की दुनिया में रचे-बसे तथा रमे लोगों की पहुँच के साथ ही आम आदमी को भी बहुत कुछ सीखने की अच्छी सामग्री हैं।

गुन्देचा बंधुओं ने पण्डित मुकुल शिवपुत्र, उस्ताद रहीम फ़हीमुद्दीन डागर, पण्डित देबू चौधरी, पण्डित शिवकुमार शर्मा, विदुषी किशोरी अमोणकर, पण्डित भीमसेन जोशी, उस्ताद अमजद अली खां, पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया, पण्डित सुरेश तलवलकर, पण्डित जसराज और उस्ताद ज़िया फ़रीदुद्दीन डागर से संगीत विशेषकर शास्त्रीय संगीत और गायन पर अनेक सवाल किए हैं।

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पुस्तक के अनुसार एक सवाल पर सभी संगीतज्ञ एकमत हैं। उनका स्पष्ट कथा है कि गुरु के बिना इस विद्या का ज्ञान नहीं मिलता। जबतक गुरुमुख से शिक्षा ग्रहण नहीं करेगा वह सम्पूर्णता प्राप्त नहीं करेगा। यथा -
‘स्वरों के आघात के पूर्व स्वरों का आभास होना चाहिए। स्वरों की सूक्ष्मतम परतें उनके प्रस्फुटन के पूर्व ही मस्तिष्क में तरंगित हो जाती हैं। ध्यान के केन्द्र में स्थित स्वरों की ये अंतर्ध्वनियाँ परत दर परत पिघलने लगती हैं जिसे ‘सुनता है गुरु ज्ञानी’ और वे श्रुत होकर गुरुमुख से श्रुतियों के रुप में झरने लगती हैं। प्रत्येक समय के बड़े संगीतकार इसी गुरु ज्ञान से और इसी गुरु ज्ञान में प्रवाहित होते हैं। इस पुस्तक का शीर्षक ‘सुनता है गुरु ज्ञानी’ रखने के पीछे भी यही ध्येय है कि हम उस ज्ञानी गुरु के प्रवाह को आप तक पहुँचाने का प्रयास कर सकें।

साधना और रियाज़ में काफी फ़र्क है। जो साध्य आप चाहते हैं, उसमें सम्मिलित होने के लिए, जो भी कार्य आप करते हैं उसे साधना कहा जाता है। ~विदुषी किशोरी अमोणकर.
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हर कलाकार की अपनी-अपनी सोच होती है और वही सोच उसे अलग दर्जे़ का कलाकार बनाती है। रियाज़ के अलावा कलाकार की सोच-समझ, उसकी संवेदनशीलता तथा उसने कितना सुन रखा है, ये सारी बातें मिलकर वाद्य पर उसके हाथ के आघात में दिखाई देती हैं या उसके आघात को एक रुप देती हैं। ~पण्डित शिवकुमार शर्मा.
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मैंने सदैव इस बात का ध्यान रखा है कि गाते हुए मुझे स्वयं को आनन्द मिल रहा है या नहीं। शास्त्रीय संगीत से हमें विशुद्ध आनन्द प्राप्त होना चाहिए, तब ही हम श्रोताओं को भी वही आनन्द दे सकते हैं। ~पण्डित भीमसेन जोशी.
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संगीत में घराने का मतलब है गाने का एक विचार या तरीक़ा। एक ख़ास और नई तरीके़ की जब कोई गायकी आती है और उसका अनुसरण आगे की पीढ़ियों में भी होने लगता है तो वह एक ‘घराना’ बन जाता है। ~उस्ताद ज़िया फ़रीदुद्दीन डागर.
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