संघर्ष और प्रेरणा से भरी है रेशमा की कहानी

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रेशमा के जीवन के अनगिनत ऐसे नाजुक हिस्से हमें यह किताब बताती है जिन्हें पढ़ने के बाद मन में हलचल सी होती है.
19 मई 2014 को जब सत्रह साल की रेशमा कुरैशी परीक्षा केन्द्र जाने के लिए घर से निकली तो सब कुछ एक पल में घट गया। वे लोग उसकी ओर दौड़े। उन्होंने उसे पकड़ा। उसके बाल खींचे। उसके चेहरे पर तेज़ाब डाल दिया और कुछ ही पलों में रेशमा जीवित मुर्दे-सी जलने लगी। तेज़ाब ने पहले उसकी चमड़ी जलाई और फिर हड्डियों को गलाने लगा, लेकिन वह रेशमा के दिल में लगी आग को नहीं बुझा पाया।’

रेशमा कुरैशी की कहानी ज़िन्दादिली, संघर्ष और प्रेरणा से भरी है। वे हालातों के आगे बिखरी नहीं, बल्कि उन्हें अपने पक्ष में करने की कोशिश की। वे डिगी नहीं, बल्कि हर बार और मजबूत बनकर उभरीं, और दुनिया को दिखा दिया कि हौंसले के आगे कुछ भी मुश्किल नहीं। उनके मुश्किल वक़्त में उनके अपनों ने उन्हें नयी इबारत लिखने को प्रेरित किया। तान्या सिंह जैसी सशक्त महिलाओं ने अपनी संस्था की मदद से रेशमा कुरैशी को उस मुकाम तक पहुँचाया जहाँ से उन्होंने हमें इंसानी ज़िन्दगी के मोल को पहचानने का संदेश दिया।

मंजुल पब्लिशिंग हाउस ने रेशमा कुरैशी के जीवन अनुभवों से सजी पुस्तक ‘मैं,रेशमा...’ का प्रकाशन किया है। रेशमा कुरैशी के साथ तान्या सिंह ने इस पुस्तक को लिखा है। अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद किया है आशुतोष गर्ग ने।
मुंबई की एक छोटी बस्ती की लड़की रेशमा ने अपनी कहानी को बचपन से शुरु किया है। हम उनके परिवार से मिलते हैं, उन हालातों से रुबरु होते हैं जब एक लड़की बड़ी हो रही होती है। हम उस समाज से मिलते हैं जिसमें तरह-तरह के लोग हैं, जिसमें प्यार, करुणा, ईर्ष्या आदि भरे पड़े हैं। और ऐसे समाज से भी, जिसमें ऐसे लोग भी हैं जिनका दिमाग सड़ांध से भरा पड़ा है। और ऐसे लोग भी हैं जो कोमल भावनाओं से जीवन की राह पर दौड़ रहे हैं।
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रेशमा लिखती हैं,‘मैं मुंबई के पूर्वी चेंबूर की एक चाल की दूसरी मंज़िल के एक कमरे में बड़ी हुई। वह एक कमरा हमारी दुनिया था।’ एक जगह रेशमा लिखती हैं कि उन्होंने बिस्कुट के पैकेट के बदले अपनी सोने की पाजेब ही दे दी। आगे पढ़ें,‘मैं सबके सामने अपनी जीत का बखान करना चाहती थी। मैंने सबूत के तौर पर बिस्कुट के खाली पैकेट भी संभालकर रखे थे।’ बाद में नन्हीं रेशमा ने रोते हुए अपनी नादानी की माफी मांगी। उनके पिता ने हँसते हुए कहा,‘तुम्हारा जितना मन को उतने बिस्कुट खाओ। हम नहीं चाहते हमारे पड़ोसी सोचें कि हम अपने बच्चों को भूखा रखते हैं। कल से रेशमा को बिस्कुट के लिए हर रोच पाँच रुपये देना।’

रेशमा के जीवन के अनगिनत ऐसे नाजुक हिस्से हमें यह किताब बताती है जिन्हें पढ़ने के बाद मन में हलचल सी होती है। हर अध्याय की एक अलग कहानी है। देखा जाए तो पुस्तक के प्रत्येक अध्याय में कई कहानियाँ, किस्से, सबक आदि भरे हुए हैं। रेशमा कुरैशी जीवन के मुलायम और सख्त वक्त को हमसे बाँटते हुए चलती हैं। ऐसा भी लगता है कि उनके पास छुपाने को कुछ ख़ास नहीं है। वे बेबाकी से हर बात कहती जाती हैं। पाठक का जुड़ाव यहीं से एक ऐसे व्यक्तित्व का प्रशंसक बन जाता है जो है आम, लेकिन उसे ख़ास वह खुद बनाता है। 

तेज़ाब से हमले के बाद रेशमा की ज़िन्दगी हमेशा के लिए बदल गयी। हालांकि उन्हें उसके बाद हर दिन दर्द का सामना करना पड़ा, लेकिन सामाजिक संस्था ‘मेक लव नॉट स्कार्स' ने रेशमा को एक अलग पहचान दी। सर रिचर्ड ब्रैनसन, सचिन तेंदुलकर, शशि थरुर जैसी मशहूर शख्सियतों ने उनकी प्रशंसा की है। ब्रैनसन कहते हैं कि रेशमा के दुख और उसकी उत्तरजीविता की यह कहानी इंसानी हिम्मत की शानदार जीत की गाथा है। वहीं तेंदुलकर के अनुसार रेशमा के प्रेरणादायक जीवन से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। थरुर मानते हैं कि यह किताब ‘भारत में हिंसा और अपमान झेल रही अनेक महिलाओं के जीवन की सच्चाई का सजीवता से वर्णन करती है।’ कविता कृष्णनन कहती हैं कि यह पुस्तक भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की दुर्दशा तथा अस्पतालों और यहाँ तक कि विख्यात डॉक्टरों में व्याप्त जबरदस्त असंवेदना को ठीक करने की दिशा में एक चेतावनी है।

रेशमा तेजाब की दर्द और पीड़ा से उबरीं। उन्होंने न्यूयॉर्क फैशन वीक में हिस्सा लिया। ऐसा करने वाली वह तेजाब हमले से पीड़ित पहली महिला बन गईं। वह महिला सशक्तिकरण के लिए कार्य कर रही हैं।

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