तलाक, हलाला और खुला की ईमानदार जानकारी

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लेखक ने ‘तीन तलाक’ पुस्तक में इसलाम में तलाक की प्रक्रिया पर विस्तार से चर्चा की है.
विख्यात साहित्यिक एवं सामाजिक टीकाकार ज़ियाउस्सलाम की पुस्तक प्रभात प्रकाशन ने प्रकाशित की है। ‘तीन तलाक’ शीर्षक की इस पुस्तक में लेखक ने तलाक, तीन तलाक, हलाला तथा खुला जैसे चर्चित धार्मिक मसलों पर विस्तृत जानकारी प्रस्तुत की है।

लेखक ने कुरान, हदीस तथा भारतीय कानून के तहत इन मुद्दों पर खुलकर विचार रखते हुए निःसंकोच टीका की है। उन्होंने प्रमुख मुस्लिम देशों में जारी इन पुरातन इस्लामी परम्पराओं का उल्लेख भी किया है। काजी और चन्द मुल्लाओं की धर्मांधता और स्वार्थलिप्तता के साथ कुरान की आयातों की गलत और मनमानी व्याख्या को भी लेखक ने निष्पक्षता से पाठकों को समझाने की कोशिश की है। लेखक का यह भी कहना है कि आम मुसलमान कुरान और हदीसों की सही जानकारी न होने से एक न्यायकारी इस्लामी कानून को ठीक से नहीं समझ पाता। यही कारण है कि एक बार में तीन तलाक को अवैध करार देने के अदालती आदेश पर तमाम मुसलमान एकमत नहीं हैं।

तलाक भी दो प्रकार का है: तलाक-ए-सुन्नाह और तलाक-ए-बिद्दत. तलाक-ए-सुन्नाह को पैगंबर की मंजूरी प्राप्त है, जबकि तलाक-ए-बिद्दत को तलाक की नई ईजाद की गई विधि माना जाता है.
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पिछले तीस सालों में बहुत कुछ नहीं बदला है, खासतौर पर पिछले पांच वर्षों में, तीन तलाक का मसला अकसर सामाजिक-राजनीतिक खेमों एवं मीडिया में उठाया जाता रहा है। प्रायः ही यह मुद्दा सुर्खियों में आ जाता है और खबर में बताया जाता है कि तुरंत तलाक की वजह से फलाँ महिला को कितनी पीड़ा उठानी पड़ रही है। तकरीबन हर बार, एक तुनकमिजाज आदमी के अविवेकपूर्ण, अनुचित आचरण का इस्तेमाल यह तसवीर पेश करने के लिए किया जाता है कि तमाम मुस्लिम महिलाएँ निरंतर तलाक के डर के साए में जीती हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, मुस्लिम समुदाय में तलाक की दर मुल्क में सबसे कम है। इसके बावजूद यह तथ्य उन लोगों के लिए मायने नहीं रखता, जो हमेशा सुविधाजनक और फौरी निष्कर्षों पर कूदने को तैयार बैठे रहते हैं। इस मसले की तह में जाने की शायद ही कोई कोशिश की जाती है। बहुत नामी शिक्षाविदों या विद्वानों ने इस्लाम में महिलाओं को उपलब्ध तलाक के हक के बारे में नहीं लिखा है। मीडिया भी मुकम्मल तसवीर पेश करने की जहमत नहीं उठाता। 
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पुस्तक में 16 पहलुओं पर कुरान और मुस्लिम खलीफाओं की सिफारिशों और आदेशों के हवाले से समझाने की कोशिश की गयी है कि इसलाम एक उदारवादी मजहब है जो महिला और पुरुष को हर क्षेत्र में समान अधिकार प्रदान करता है। हलाला, तलाक और खुला पर पूरी जानकारी दी गयी है। पुस्तक में, बहु-विवाह पर कुरान क्या कहता है? क्या महिला भी तलाक दे सकती है? हलाला की हकीकत? शिया-सुन्नी के तलाक के तरीके क्या-क्या हैं? काजी अदालतों में तुरंत तलाक, हलाला और खुला? मुस्लिम देशों में तलाक की मनाही आदि पर विस्तार से लिखा गया है। मीडिया आदि में बहुचर्चित इन मुद्दों पर लेखक ने स्पष्ट और ईमानदार जानकारी दी है। पुस्तक सभी के लिए पठनीय है।

कुरान एक आदमी को अपनी गलतियों से सीखने के काफी मौके देती है. यदि वह नहीं सीखता है और विवाह की समाप्ति न पलटने योग्य तलाक में होती है, तो उसकी पूर्व पत्नी उसके लिए अजनबी हो जाती है. ऐसा महिला के सम्मान की रक्षा के लिए किया जाता है.
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भारत के कुछ हिस्सों में हलाला का जिस तरह का रिवाज प्रचलित है, वह मजहब का मजाक है. यह एक लघुकालिक विवाह की तरह होता है, आधुनिक मुता होता है, जिसमें तलाक की पूर्व शर्त होती है. कोई भी विवाह, जिसमें तलाक के लिए वक्त तय हो, इस्लाम में मान्य नहीं है. विवाह एक पवित्र बंधन है, जिसके साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता है.
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शौहर को तलाक देने का बेलगाम हक नहीं दिया गया है. इसके लिए एक लंबी प्रक्रिया है, जिसमें दंपति के अलावा, दोनों परिवारों से मध्यस्थ भी शामिल होते हैं. शौहर और बीवी को एक-दूसरे पर एक समान अधिकार हैं, सिवा इसके कि शौहर कवाम(नेता) होने के नाते एक डिग्री ऊपर है.
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