‘पद्मावती उन दिलों में रहती है, जिसका पता दिल को भी नहीं है’

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प्रेम का अननुभूत वात्सल्य और यौवन के उत्कट हिमालय का जहां संगम हो, वहाँ है पद्मावती..
'अथ पद्मवाती' विश्‍व-विख्‍यात चित्‍तौड़ की रानी पद्मावती को प्रस्‍तुत करता है। इतिहास के गलियारे से गुज़रता हुआ अनेक संशयों का सामना करता है। पुराणात्‍मक कथा-आख्‍यान का सहारा पाकर उपन्‍यास का कथानक बनने में सहायक होता है। यदि इतिहास के धुंधले पृष्‍ठ प्रचलित आख्‍यानों की सहायता से एक आकार ले सके तो ये कम बड़ी बात नहीं है। दरअसल, जब इतिहास पुराण कथा या लोककथा में स्‍थान पा जाता है, तब वह अमर ही नहीं हो जाता है प्रत्‍युत उस संस्‍कृति की अक्षय सम्‍पत्ति सिद्ध होता है। अब पद्मावती इतिहास की कम लोक-कथा की अधिक सशक्‍त व जीवन्‍त उदाहरण बन चुकी है।

साहित्‍य इतिहास का कथानक नहीं, उसकी अन्‍तरात्‍मा का आख्‍यानात्‍मक प्रकाश है, अमर ज्‍योति है। स्मरण रहे, इतिहास का हर इतिवृत्त साहित्य नहीं बन सकता। साहित्य संवेदनाओं का संस्कार है। खलील जिब्रान का यह कथन तत्सम्बन्ध में हमारी मदद करता है कि,‘‘जब तुम दुख से भर जाओ तो अपने दिल की गहराईयों में उतर कर देखो; कदाचित् उल्लास का कोई कारण वहाँ हो, जिसके लिए तुम अवसाद से घिरे थे।’’ यथार्थतः साहित्य इतिहास का वर्तमान और अनागत दोनों होता है। साहित्य से यह प्रश्न मत करो कि तुम इतिहास हो। यदि इस दृष्टि की गहराई में उतर कर देखा जाये तो पद्मावती मानव जीवन की जीवन्त धरोहर प्रमाणित होती है। पद्मावती उसी ही प्रतिध्वनि है। उदात्त प्रेम के अन्तस्थल में उतर कर संवेदनाओं का वह ऐसा अन्तरंग अनुभाग बनने लगती है कि गोचर-अगोचर की यात्रा हृदयस्थली झील के अद्वैत आनन्द को तरंगों को अनुभव कराती है।

साहित्य का विषय आनन्द है और यही उसका लक्ष्य है। प्रेम का सौन्दर्य क्या है? उसकी आशा-आकांक्षाएं क्या हैं? उसका आनन्द क्या है? इन प्रश्नों का उत्तर उनसे मिल सकता है जो लुप्त सरस्वती की उर्मियों के आनन्द की गहराई में उतर कर स्वयं आनन्द की अनुभूति बन चुके हैं। प्रेम का अननुभूत वात्सल्य और यौवन के उत्कट हिमालय का जहां संगम हो, वहाँ है पद्मावती।
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उसको तलाशने की यात्रा प्रारम्भ की है जिसमें इस समय, इसे पढ़ते हुए आप भी मेरे साथ हैं। उन विषम परिस्थितियों और विषताओं में जिनमें कभी आनन्द का स्रोत सधता नहीं है। और हर पल खंजड़ी मन में गजरे-ग़ज़ल की प्रतिध्वनि, सारे झाड़-झंखाड़ को किनारे कर, बिना झाँझ के, झाँझ के जुनून में कैसे सिर चढ़कर बोलने लगती है! जो गायक नहीं बन सके, उनमें कैसे कोयल-पपीहा का मधुर स्वर गूँजने लगता है और कैसे जो देख नहीं पाते उनमें खंजन नयन खुलने लगते हैं। कैसे शकुन्तला के लालन-पालनहार कण्य ऋषि निराशा की घनघोर मेचक घटाओं में चपला बन उसको आश्वस्त करते हैं। पद्मावती उन्हीं परम्पराओं की अगली कड़ी है। अनुभव कर सको तो करो कि कैसे एक खि़दमतगार सितम रसीदा में सिजदा करने की नमाज़ को रफ़्ता-रफ़्ता इस नफ़ासत से करने लगता है कि उसे पता ही नहीं चलता कि वह कब नमाज़ी से रब की पहचान बन गया। कैसे पता पूछते-पूछते ख़ुद ही उसका पता बन गया। उनसे पूछा जो बन चुके हैं दीदार-ए-हुस्न के हमप्याले कि पद्मावती की असली दास्तान क्या है जो सदियों बाद आज भी रोशनी की रौनक बनी हुई है? यह प्रयत्न उसी के लिए है जिनकी धड़कनें ज़िन्दगी में करवट बदलती रहती हैं।

मैं पूगल गया था जो रणथम्भौर का पता पाया, रणथम्भौर पहुँचा तो चित्तौड़ का ठिकाना मिला। तब एक फ़कीर ने कहा,‘‘क्यों मारा-मारा फिर रहा है, पद्मिनी-पद्मावती उन दिलों में रहती है, जिसका पता दिल को भी नहीं है।’’ हक़ीक़त में इस दास्तान का रहस्य यही है कि हम ज़िन्दादिल ज़िन्दगी के साथ उस रहस्य को स्वयं तलाशते रहते हैं। वह भी इस उम्मीद से कि कोई तो हमसफ़र बने।

~राजेन्द्र मोहन भटनागर.

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