मैजिक मुहल्ला : ‘भाषा में बह जाता जगत्’

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दिलीप चित्रे ने मराठी के अलावा अंग्रेज़ी में सीखा, लिखा और कई मराठी-हिन्दी कवियों की कविताओं के अनुवाद भी अंग्रेज़ी में किये.
हमारा समय कविता से जो अपेक्षा करता है उनमें से कई आधुनिकता के पहले की कविता से प्राय: नहीं की जाती थी। यह और बात है कि वह कविता भी बिना चाहे या जाने कुछ अपेक्षाएँ पूरी करने में समर्थ रही है। बुनियादी अपेक्षा है कि कविता हमें जीवन-जगत्-आत्म के बारे में, उनमें चल रहे अन्तर्द्वन्द्वों के बारे में बताये-बताये उतना नहीं जितना हमारे अहसास को गहरा और सच्चा करे कि हम किस समय में रह रहे हैं। तनाव, द्वन्द्व, विडम्बना, अन्तर्विरोध, वैकल्पिक सचाई, स्वप्न और दु:स्वप्न इस क़दर आज की कविता में व्याप्त हैं कि हम उन्हें भाषा की तरह ही कविता के लिए अनिवार्य, स्वाभाविक मानने लगे हैं! कविता में, इन दिनों, जीवन का उत्सव भी अनेक विडम्बनाओं और तनावों के माध्यम से ही मनाया जाता है। कविता में यह बुनियादी परिवर्तन हमारे समय की ही देन नहीं है-वह कवियों द्वारा अपनी कल्पना, कौशल और संघर्ष से अर्जित किया गया है। बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और इक्कीसवीं के आरम्भ में जिन कवियों ने निर्भीकता, साहस, कल्पना के नवाचार और अपनी प्रगल्भ प्रखरता से काव्यशास्त्र बदला उनमें मराठी कवि दिलीप चित्रे रहे हैं। यह कविता का वितान बदलना भर नहीं था : यह उसके भूगोल का विलक्षण विस्तार था। यह कविता के इतिहास को ताज़ा नज़र से देखकर पुनरायत्त और किसी हद तक पुनराविष्कृत करना था। यह निरन्तर परिवर्तन की क्रान्ति थी जो अब टिकाऊ हो गयी है और अब तक अबाध चल रही है।

दिलीप चित्रे द्विभाषिक कवि थे। उन्होंने मराठी के अलावा अंग्रेज़ी में सीखा, लिखा और कई मराठी-हिन्दी कवियों की कविताओं के अनुवाद भी अंग्रेज़ी में किये। वे चित्रकार थे और उनके कुछ चित्रांकन इस हिन्दी संचयन में शामिल हैं। उन्होंने फ़िल्में भी बनायीं। भारत भवन में रहते उन्होंने शमशेर बहादुर सिंह के कविता-पाठ पर एक बहुत सुन्दर फ़िल्म बनायी थी। उनकी हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में गहरी पैठ थी और उसके बारे में उन्होंने, जब-तब, मार्मिकता और गहरी संवेदना से लिखा। वे कुशल सम्पादक थे और उन्होंने अंग्रेज़ी और मराठी में कई पत्रिकाओं का बहुप्रशंसित सम्पादन किया।

अपनी सारी वैचारिक सघनता और प्रखरता के बावजूद, या शायद उसके कारण, दिलीप जानते थे कि जीवन और सचाई, भाषा और रूपाकार अत्यन्त जटिल होते हैं और उन्हें एक कवि सरलीकृत या सामान्यीकृत नहीं कर सकता। ऐसा करना कविकर्म का ही प्रत्याख्यान होता। दूसरे, दिलीप को इसका भी पूरा तीख़ा अहसास था कि हमारा समय और समाज, अपनी सारी आधुनिकता के बावजूद, सच और सचाई के अलक्षित पक्षों का सामना करने की ताब नहीं रखता है। दिलीप कभी मुनासिब नाटकीयता के साथ और कभी बिना किसी नाटकीयता के, अपने ग़लत या कई बार अनैतिक समझे जाने का जोख़िम उठाकर कविता में सच कहने, सत्यकथन का लगातार दुस्साहस करते थे। कठिन समय में सच भी कठिन होता है और उसे किसी आसान तरीक़े से समझा-कहा-खोजा नहीं जा सकता। दिलीप चित्रे का अपना काव्यशिल्प इस दुहरी कठिनाई से जूझता कठिन शिल्प है जिसे सच की प्रामाणिकता अधिक प्यारी है, सरलता का आकर्षण प्रलोभन नहीं उसका अभीष्ट नहीं। उनकी कविता जगत्समीक्षा और आत्मसमीक्षा कई बार एक साथ है। हमें वही कवि अपने सच कहने से भरोसे का लगता है जो अपनी सचाई का भी निर्ममता से बखान कर सके। उनकी कविता कभी-कभी ‘हरामज़ादी आवाज़’ भी बन सके इस जतन से वे कभी विरत नहीं हुए।

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जो कविता हमारी जिजीविषा न बढ़ाये, जिज्ञासा न उकसाये, निरुपायता से मुक्त न करे, हमें अपने सबसे ख़राब सपनों का सामना करने की ताब न दे वह हमारे ज्य़ादा काम या दिलचस्पी की नहीं हो सकती। दिलीप की कविता का वितान इतना विस्तृत है कि उसमें अदम्य जिजीविषा, अपार जिज्ञासा, विकल्प की अथक तलाश और झुलसाने वाली ताब के क्षण बार-बार कभी अकेले, कभी और तत्त्वों के साथ सहज ही मिलते रहते हैं। वह एक स्तर पर एक बेचैन-नाराज़-चीख़ते कवि का आदमीनामा है जो दूसरी ओर एक ऐसे समय का छोटे-छोटे, कई बार बेहद घरेलू ब्योरों में चरितार्थ और विन्यस्त आख्यान जिससे क्रान्तियों की विफलता राजनीति और धर्म के विद्रूप, भारतीय समाज की बढ़ती हिंसा, आर्थिकी द्वारा लादी जा रही गोदामियत, विचार को अपदस्थ करने के षड्यन्त्र, भाषा का सचाई से बढ़ता विच्छेद और-और आत्म और व्यक्ति के तरह-तरह के अवमूल्यन देखे-सहे हैं। ऐसे तुमुल में दिलीप उन कवियों में रहे हैं जिन्होंने मानवीय अन्त:करण, प्रतिरोध और प्रश्नवाचकता की आवाज़ को कविता के रूप में बचाने, उसके लिए जगह बनाने की असमाप्य चेष्टा की।

एक ऐसे दौर में जहाँ विराट् और उससे अपने सम्बन्ध और संवाद को समय से लगता है कि स्थगित या निलम्बित ही कर दिया, वहाँ दिलीप ने इस विराट का स्पन्दन कविता में फिर से बसाने का साहस किया। कविता का अगर एक ज़रूरी काम अपने इतिहास के ऐसे मुक़ाम पर जिसमें भूलने-भुलाने का महागठबन्धन हो रहा हो, याद दिलाना, जातीय स्मृति को सजीव करना है तो दिलीप चित्रे ने यह काम अपनी कविता और अनुवाद दोनों में बड़ी दक्षता और सूक्ष्मता से किया। बहुतों को ‘ज्ञानेश्वरी’ या तुकाराम की कालजयिता और हमारे समय के लिए प्रासंगिक बने रहने की पहचान और अनुभव दिलीप के माध्यम से ही हुए।

दिलीप चित्रे एक अन्तरराष्ट्रीय यायावर भी थे। वे पश्चिम से वैचारिक, सर्जनात्मक और भौतिक अनुभव इन सभी स्तरों पर जूझे थे। उनमें एक सच्चे आधुनिक का खुलापन था जो महत्त्वपूर्ण और सार्थक से, फिर वह कहीं से आये, प्रतिकृत होने को तैयार थे। पर उनमें उतना ही गहरा और सदा-सक्रिय आत्मबोध भी था जो अपनी सच्ची अस्मिता को कभी हाशिये पर नहीं डालता था। वे साहित्य में उन भारतीय लेखकों में से, जिनमें अज्ञेय, यू आर अनन्तमूर्ति, निर्मल वर्मा, सुरेश जोशी, शंख घोष जैसे लेखक शामिल थे, एक थे जो पश्चिम से समकक्षता के भाव से संवाद कर सकते थे। दिलीप पश्चिम से प्रतिकृत थे, आक्रान्त नहीं।

दिलीप चित्रे का हिन्दी से विशेष सम्बन्ध था। निर्मल वर्मा और मुझसे उनकी लम्बी मित्रता रही। वे श्रीकान्त वर्मा, रघुवीर सहाय आदि से सुपरिचित थे। उन्होंने शमशेर बहादुर सिंह, विनोदकुमार शुक्ल आदि के मराठी और अंग्रेज़ी अनुवाद किये। चन्द्रकान्त देवताले और विष्णु खरे उनके घनिष्ठ रहे। भारत भवन भोपाल में वे निराला सृजनपीठ पर थे। यह कहा जा सकता है कि वे हिन्दी कविसंसार से भलीभाँति परिचित थे और इसलिए हिन्दी में उनकी मराठी कविता के इस संचयन का प्रकाशन, एक तरह से, हिन्दी की इस मराठी घनिष्ठता को एक स्वाभाविक प्रणति है।

हिन्दी में आने से उसके सजग-संवेदनशील पाठकों को यह अनुभव होगा कि हमारे लगभग कविता-विरत समय में कविता कैसे समय और सचाई को, आत्मा के अँधेरों और सपनों के उजालों को हमारे लिए बचाकर रख सकती है। उसे पढ़ना अपने समय और आत्म को, अपने आसपास की सचाई को, अपनी विकट स्थिति को, उनकी सारी विडम्बनाओं में, रूप और विद्रूप में देख पाना और अधिक सतर्कता से देख पाना है। हालाँकि यह उसका काम नहीं है वह ऐसी कविता भी है जो हमारी नैतिक संवेदना को भी तीक्ष्ण करती है।

आसानी से याद नहीं आता कि हिन्दी में किसी कवि ने ऐसी बेबाकी से कहा हो जैसा दिलीप चित्रे अपनी एक कविता का समापन करते हुए कहते हैं :

मुझे ख़ुशी है कि मैंने बेहतर कर्म किया
कि पा सकूँ यह टोस्ट और बटर
और अपनी व्यथा बता सकने के लिए अंग्रेज़ी बोल सकूँ।
वेटर, बिल। यह एक अद्भुत सुबह है, चमकती हुई।
सूर्य अब कर्क में आ चुका है।
मेरे दु:स्वप्न ढल चुके हैं।
मैं अब एक अश्वत्थामा की तरह स्वस्थ हूँ
या एक भटकते यहूदी की तरह
और ये शताब्दियाँ मेरा अनाज हैं।

~अशोक वाजपेयी.

मैजिक मुहल्ला पुस्तक से कुछ पंक्तियाँ देखें -
शहर में जैसे मुहल्ला
मुहल्ले में जैसे मकान
मकानों में जैसे खल्वत
वैसे ही दुनिया भर में हम
सभी धर्म ख़त्म होने के बाद
धर्म शुरू होने से पहले
अल्ला का अलौकिक मौन
झरने की कल्पना जैसा
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मुझे दोषी कहा जायेगा
उगते हुए सूरज पर अन्धा होने का
जब हल्दी का पीलापन लिए बादल
उसकी दमक में फूट पड़ते हैं
मुझसे पूछे जायेंगे सवाल
अपना गीत भूल जाने पर
वह कोई सामान्य ईश्वर नहीं
सिर्फ एक पागल हवा है
जो उम्मीद से भी ज़्यादा
उमड़ सकती है
मैं जवाबदेह नहीं हूँ
अपने परम आनन्द के लिए.
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मैं उल्टी दिशा में चल पड़ा तो क्या हुआ?
मैं खोजता रहा जड़ें और शाखाएँ जग भर में
मुझे चाहिए था मुझसे लिपटा हुआ घना जंगल
और रिश्ते जोड़ने के लिए कीड़े-मकौड़े, पशु-पक्षी, और मनुष्य :
एक गंजी टेकड़ी से समाज में मैं कवि हो गया।
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प्रकाशक : वाणी प्रकाशन

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