पटना ब्लूज़ : अधूरे ख़्वाबों की कहानी

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अपनी रोचकता के चलते ही ये उपन्यास हिंदी के अलावा उर्दू, बांग्ला, तमिल, कन्नड, मलयालम और मराठी में छापा जा रहा है.
कुछ किताबें नाम से आकर्षित करती हैं तो कुछ कलेवर से मगर असल किताब वही है जो कहानी के दम पर बाँधे रह जाये। अब्दुल्लाह खान की किताब पटना ब्लूज़ तीनों पैमाने पर खरी उतरती है। अब्दुल्लाह बैंकर हैं और मुंबई में रहते हैं तो पटकथा के साथ साथ उपन्यास भी लिखते हैं। पटना ब्लूज़ के नाम से ही साफ है कि कहानी पटना शहर की होगी मगर ये कहानी पटना शहर के आसपास गाँव कस्बों में भी ऐसे घूमकर बार बार पटना आती है कि पता ही नहीं चलता।

उपन्यास में पटना के एक मुसलिम परिवार की कहानी है जिसका जवान लड़का आरिफ यूपीएसीसी पास कर अफसर बनना चाहता है तो उसका भाई जाकिर मुंबई जाकर फिल्म एक्टर बनना चाहता है मगर किसी भी गरीब परिवार में ऐसे सपनों को पूरा करने के लिये कितनी कम गुंजाइश होती है। ये इस उपन्यास की कहानी में बहुत सच्चाई के साथ लिखा गया है। वैसे भी उपन्यास का पूरा नाम 'पटना ब्लूज़ : कुछ ख़्वाब अधूरे से' है।

अधूरे ख़्वाबों वाले इस उपन्यास का नायक आरिफ पुलिस सब इंस्पेक्टर का बेटा है जो बेहद प्रतिभाशाली है और यूपीएससी पास कर आईएएस अफसर बनना चाहता है मगर कुछ खास परिस्थितियों के चलते वो अपने से बड़ी उमर की शादीशुदा सुंदर महिला सुमित्रा से प्रेम के चक्कर में पड जाता है। घटनाक्रम कुछ ऐसा होता है कि ना तो वो अफसर बन पाता है और ना ही उस महिला के करीब पहुँच पाता है। साथ ही परिवार की जिस लड़की से उसकी शादी होने वाली होती है वो भी मजबूरी में ही उससे शादी को तैयार होती है। आरिफ का भाई जाकिर भी पहले मुंबई जाकर गायब हो जाता है फिर दिल्ली में पुलिस की निगाह में आकर रहस्यमय परिस्थितियों में लापता हो जाता है जो उपन्यास के अंत में ही वापस आ पाता है। इस बीच में पुलिस उत्पीड़न की लंबी कथा है जो आमतौर पर मुसलिम समाज के युवाओं के साथ अक्सर दोहरायी जाती है।
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यह उपन्यास इस मायने में अलग है कि पटना के मुसलिम परिवार के बहाने इसमें मुसलिम समाज में होने वाली उथल-पुथल पारिवारिक परिस्थितियाँ और परिवार के दुख-दर्द बहुत खूबसूरती से पिरोये गये है। कथानक इसमें इतनी तेजी से घूमता है घटनाएँ ऐसी लगातार होती हैं कि उपन्यास पाठक को हाथों से नीचे नहीं जाने देता।

लेखक अब्दुल्लाह ने इस उपन्यास में अपने पटकथा लेखन के सारे दाँव पेंच आजमाये हैं। पहले पन्ने से आखिरी तक रोचकता बनी रहती है। पूरे उपन्यास में आरक्षण आंदोलन, राम मंदिर आंदोलन, दिल्ली के बम ब्लास्ट और उसमें फँसने वाले मुसलिम युवकों की घटनाप्रधान पृप्ठभूमि है जो उपन्यास को नयी ऊँचाई देती है। पटना शहर के गली मोहल्लों और घाटों को भी अब्दुल्लाह ने ऐसा सजीव बना कर लिखा है जिससे पढ़ने वाले को पटना शहर अपना सा लगने लगता है। आज के दौर में मुसलिम समाज का जीना उथल पुथल और अनिश्चितता से भरा है। लेखक ने मध्यमवर्गीय मुसलिम परिवार का बहुत सजीव चित्रण किया है।

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पहले के दौर में लिखे गये मुसलिम परिवेश के उपन्यास आमतौर पर बेहद गरीब या फिर अमीर तबकों पर ही ज्यादा लिखे गये हैं मगर इस उपन्यास में जिस परिवार को केंद्र में रखा गया है वैसे परिवार ही आज ज्यादा हैं और जिनकी परेशानियाँ हूबहूू वही हैं जो उपन्यास में साझा की गयी हैं। अपनी रोचकता के चलते ही ये उपन्यास हिंदी के अलावा उर्दू, बांग्ला, तमिल, कन्नड, मलयालम और मराठी में छापा जा रहा है। इसे भोपाल के मंजुल पब्लिशिंग हाउस ने बहुत सुंदर कलेवर और छपायी के साथ छापा है।

~ब्रजेश राजपूत.
(लेखक ABP न्यूज़ से जुड़े हैं. ब्रजेश ने तीन बेस्टसेलर पुस्तकें लिखी हैं. उनकी हालिया किताब 'चुनाव है बदलाव का' चर्चा में है.)

पटना ब्लूज़ : कुछ ख़्वाब अधूरे से
लेखक : अब्दुल्लाह खान
प्रकाशक : मंजुल पब्लिशिंग हाउस
पृष्ठ : 292
किताब का लिंक :https://amzn.to/2Sw0Upg

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