बहेलिए : नारी अस्मिता और आज़ादी पर बेबाक लेखन

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कहानियों में अतीत की सामाजिक व्यवस्था की कल्पनाओं को दरकिनार कर नारी जीवन पर यर्थाथवादी लेखन किया गया है.
युवा लेखिका अंकिता जैन का कहानी संकलन 'बहेलिए' प्रकाश में आया है। इसे प्रकाशित किया है राजपाल एण्ड सन्ज़ ने। लेखिका की यह तीसरी पुस्तक है। इससे पूर्व प्रकाशित उनकी दोनों पुस्तकें 'माँ से माँ तक' तथा 'ऐसी वैसी औरत' को पाठकों ने खूब सराहा है।

'बहेलिए' में सात कहानियाँ हैं। इन सभी कहानियों में अतीत की सामाजिक व्यवस्था की कल्पनाओं को दरकिनार करते हुए आधुनिक समय में नारी जीवन पर यर्थाथवादी लेखन किया गया है। जैसाकि शीर्षक से ही पता चलता है, हमारे समाज में ऐसे बहेलिए शिकारी महिलाओं के पीछे घर से बाहर तक हर जगह, हर समय मौजूद हैं। जो उसे गुलाम बनाकर उसका मानसिक, शारीरिक तथा सभी तरह का शोषण करने पर तुले हैं। लेखिका इसके लिए केवल पुरुष वर्ग को ही नहीं बल्कि सामाजिक जड़ताओं की रुढ़ियों से ग्रसित महिलाओं को भी उत्तरदायी मानने से इंकार नहीं करतीं।

यह कहानी संग्रह उन सभी स्त्रियों की कहानी है जिनके जीवन में बहेलिए आए, उन्हें कैद करने की कोशिश भी की, मगर क्या वे कैद हुईं? यह आप कहानियाँ पढ़कर ही जानेंगे.
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वैसे तो सभी कहानियाँ साहित्यिक और भावनात्मक स्तर पर काफी सफल बन पड़ी है लेकिन 'कन्यादान' नामक कहानी मानवीय संवेदनाओं, लेखन-शैली और तमाम घटनाक्रम को प्रस्तुत करने में बहुत सफल हुई है।

पाठक पात्रों विशेषकर हमारे निर्धन वर्ग की बेबसी का सटीक तथा यर्थाथ चित्र देखकर भावुक हो उठता है। गरीबी, अभाव और वेदना के सम्मुख आखिर नारी को ही अपनी तमाम भावनाओं, इच्छाओं और आत्मिक सुख सुविधाओं की बलि देने को विवश होना पड़ता है।

'कन्यादान' कहानी से भावनात्मक अंश देखिए :
हबलू की बातें सुन बाबा को लगा जैसे किसी ने उन्हें किसी गड्ढे में गाड़ दिया हो। उनकी बेटी अपने बाप की लाचारी के आगे इतनी मजबूर हो गई कि अपनी ही बोली लगा गई। बहुत हिम्मत करके वे काँपते क़दमों से घर पहुँचे कि कैसे उसका सामना करेंगे। घर पहुँचे तो सुमन देहरी पर बैठी उन्हीं का इंतज़ार कर रही थी...

अंकिता की कहानियों में जीवन के वास्तविक मुद्दे, घटनाएँ इस तरह संजोयी जाती हैं कि पाठक उनसे स्वत: जुड़ जाता है। हर कहानी अपना प्रभाव छोड़ती जाती है। आप कहानी को गहराई से डूब कर पढ़ने को बाध्य हो सकते हैं। बेहद पठनीय संग्रह।

बहेलिए 
लेखिका : अंकिता जैन
प्रकाशक : राजपाल एंड सन्ज़
पृष्ठ : 128

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