काफ़िल का कुत्ता : कहानियाँ जो अपनी सी लगती हैं

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विक्रम सिंह ने समाज को जैसा देखा-परखा-जाना उसी मुताबिक अपने भावों को शब्दों के माध्यम से कागज पर उकेर दिया है.
विक्रम सिंह की कहानियाँ हमारे आसपास की कहानियाँ हैं। यहाँ वही लोग हैं, वही किस्से हैं, वही भावनाएँ हैं, वही सब है जो हम आए-दिन देखते या महसूस करते रहते हैं। ये कहानियाँ कहीं से भी परायी या दूसरी नहीं लगती, बल्कि हर कहानी का एक भाव है, एक छुअन है, जिसका असर पाठक पर पड़ता है। हर कहानी अपनी कहानी बताती है। हर पात्र हमारा देखा-सुना-जाना-पहचाना है। इसलिए विक्रम सिंह की कहानियों को पढ़ते समय पाठक यह अहसास कर सकते हैं कि जो कुछ वे पढ़ रहे हैं वह उनके आसपास की दुनिया में ही घटा है।

बनावटी कहानियाँ सच्चाई से दूर होती हैं। उनमें जज्बातों की कमी खलती है। वह सब नहीं होता जो होना चाहिए। जब कहानी बेजान होगी, अपनी बात कह पाने में असमर्थ होगी तो वह कहानी बेकार है। मगर जब कहानी हमारे साथ, हमारी बात कहती नज़र आएगी और समाज की बात करेगी तो वह मुकम्मल कही जा सकती है। विक्रम ने कहानियों को अलग पहचान देने की कोशिश की है।

विक्रम सिंह की यह पुस्तक उनकी पाँच कहानियों का संग्रह है। उन्होंने समाज को जैसा देखा-परखा-जाना उसी मुताबिक अपने भावों को शब्दों के माध्यम से कागज पर उकेर दिया है। यही वजह है कि विक्रम की कहानियाँ सोचने पर मजबूर करती हैं। पाठक गंभीरता से उन्हें पढ़ता है।

‘काफिल का कुत्ता’ कहानी में विक्रम सिंह ने बेरोजगारी की अंधी दौड़ के बारे में बताया है कि कैसे लोग दूसरे मुल्कों में कमाने जाते हैं, लेकिन वहां उनकी स्थिति उनके देश से भी बदतर हो जाती है। बाद में उनके सामने उससे समझौता करने के सिवा कोई चारा नहीं रह जाता। मायूसी का भंवर उन्हें घेर लेता है। लेखक यह भी बताना चाहता है कि सोच-विचार कर जीवन के पड़ावों को पार करना ही समझदारी कहलाती है।

इस कहानी-संग्रह की हर कहानी को पढ़ना अच्छा अनुभव है।

काफ़िल का कुत्ता
लेखक : विक्रम सिंह
प्रकाशक : अमन प्रकाशन
पृष्ठ : 128

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