गाँवों-कस्बों की भूली-बिसरी कहानियाँ

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लिट्टी-चोखा और अन्य कहानियाँ आते हुए दौर के लिए बीते हुए दौर के अल्बम की तरह है.
लिट्टी-चोखा और अन्य कहानियाँ' एक ऐसा संग्रह है जिसमें किस्से हैं, भावनाएँ हैं, मस्ती-मज़ाक-दुःख-रंज है। ज़िन्दगी के बहते हुए रंग हैं। कुछ उजला, कुछ गहरा, कुछ अलबेलापन है। कहानियाँ किसी निष्कर्ष तक पहुँचे या नहीं, लेकिन पाठक में उत्सुकता करती ज़रूर हैं। मन के कोने कई जगह हलचल महसूस करते हैं। गीताश्री का लिखा सोचने पर गहराई से मजबूर करता है।

संग्रह की पहली कहानी 'लिट्टी-चोखा' आपको किताब से चिपका देगी। चंदू जब रम्या के पैर दबाता हुआ झूम-झूम कर गाता है -'मेरा गुलाबी दुपट्टा, हमें लग जइयो नज़रिया रे...', तो उसके बीते दिनों की यादें ताज़ा होने लगती हैं। चंदू उसे किस्से सुनाता है कि कैसे एक बार झगड़े में इसी लिट्टी से उसने कई लड़कों के सिर फोड़ दिए थे। एक बार किसी ने उसकी बहन को छेड़ दिया था, तो चोखा उसके नाक मुँह में ठूंस दिया था। चटनी उसकी आँखों में फेंक दी थी। मतलब समय पड़ने पर लिट्टी हिंसक हथियार में बदल सकती है।

गीताश्री की कहानियाँ एहसास के साथ चलती हैं। प्रेम की भाषा कैसी होती है, प्रेम कितना गहरा है, उसका फैलाव कितना है, तथा प्रेम विश्वास के धागों से कितना जुड़ा है, यह संग्रह की तीसरी कहानी 'स्वाधीन वल्लभा' पढ़कर जाना जा सकता है।

"प्रेम दीवानियाँ कहाँ मानती हैं। स्त्रियों को प्रेम जहाँ साहसी बना देता है, वहीं पुरुषों को डरपोक। वो छुपाना चाहते हैं। बचना चाहते हैं अप्रिय स्थितियों से। जब तक बहुत ज़रुरी न हो, मुखर नहीं होते प्रेम को लेकर। जबकि स्त्रियाँ शुरु में ही मुखर हो उठती हैं, टकरा जाती हैं, टकराने को तैयार रहती हैं। प्रेम उनके भीरु मन के लिए आश्वासन की तरह होता है।'

इस कहानी में परदेशी बहू का बिहार के गाँव में आना, दुभाषिया, शादी की शर्तें, आदि के दृश्य बहुत अच्छी तरह पिरोये गए हैं।

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जमीनी हकीकत से रूबरू करातीं ये कहानियाँ गाँव-कस्बे से होते हुए हमें शहर ले जाती हैं जहाँ ज़िन्दगी की रफ़्तार रिश्तों से तेज़ है। ये कहानियाँ हमें टुल्लू और नीलू जैसे लोगों से मिलाती हैं जिनकी अपनी-अपनी मंजिलें हैं, रास्ते हैं और जिनके अपने सपने हैं जो दिल और दिमाग से होकर गुज़रते हैं। जब दौड़ती ज़िन्दगी की नाव में हम सवार होते हैं, तो बहुत कुछ पीछे छूट जाता है। वैसे भी अच्छी और शानदार ज़िन्दगी किसे नहीं चाहिए। पैसा मेहनत और हुनर से आता है। टुल्लू की ज़िंदगी फ़िल्मी हो गई।

गीताश्री उन चुनिंदा लेखिकाओं में हैं जिनकी कहानियों का अपना ‘लोकेल’, अपनी बोली-ठोली है जो स्थानीय जीवन संदर्भों में गहरे रचा-बसा है। उनकी अपनी सघन भाषा भी है जिसमें बोली के मुहावरे बहुत प्रमुखता से दिखाई देते हैं। लिट्टी-चोखा और अन्य कहानियाँ कहानी-संग्रह की दस कहानियाँ इसका बेहतरीन उदाहरण हैं। संग्रह की कहानियों में तिरहुत-मिथिला के धूल पगे गाँवों-क़स्बों की भूली-बिसरी कहानियाँ कभी वहाँ की समृद्ध सामाजिकता की याद दिला देती हैं तो कभी विस्थापन की गहरी टीस से भर देती हैं। उनकी कहानियों के परिवेश ही नहीं किरदार भी याद रह जाने वाले हैं। राजा बाबू, पमपम बाबू जैसे कलाकार हैं जिनको कभी पहचान नहीं मिल पाई, नीलू कुमारी है जिसको दिल्ली में नौकरी मिल जाती है और क़स्बे में प्रेमी पीछे छूट जाता है। यह गीताश्री की कहानियों का नया मुक़ाम है जिनमें अपने अपनों से छूट रहे हैं, भास-आभास की दूरी मिटती दिखाई दे रही है, जो जहाँ है वह वहीं नहीं है। सब भ्रम है, यथार्थ कुछ भी नहीं।
 लिट्टी-चोखा और अन्य कहानियाँ आते हुए दौर के लिए बीते हुए दौर के अल्बम की तरह है, मानो लेखिका जिसे झाड़-पोंछकर पढ़ने वालों के लिए सहेज रही हो। गीताश्री की कहानियों में ग्रामीण-कस्बाई जीवन के सघन समाज से लेकर महानगरीय जीवन की अकेली लड़ाइयाँ तक मौजूद हैं।

गीताश्री की कहानी की शुरुआत बहुत सहज तरह से होती है। हालांकि उत्सुकता पहले से बढ़ जाती है, लेकिन कहानी के अंत तक उसे बनाए रखना जरूरी है, जिसे उन्होंने बख़ूबी निभाया है। सबसे अच्छी बात उसके बाद भी हम उत्सुक रहते हैं। हर कहानी गहराई से सोचने पर विवश करती है।

यहाँ हर कहानी पर चर्चा नहीं की जा सकती। आप कहानियाँ पढ़िए, अच्छा लगेगा। कहानियाँ किसी शोर से परे हैं। इंसानों के द्वारा पैदा की उलझनों, सुलझनों के बीच तंग, आज़ाद गलियों में हलचल करती हुई घूमती हैं। जिस तरह गीताश्री पाठकों को अपने साथ लेकर खूबसूरत सफ़र पर ले चलती है, वह अनुभव कभी न भूलने वाला होता है।

लिट्टी-चोखा और अन्य कहानियाँ
लेखिका : गीताश्री
प्रकाशक : राजपाल एंड सन्ज़
पृष्ठ : 112

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