रैवन, लोककथाओं का हीरो भी है

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आजकल रैवन कैनेडा देश के यूकोन प्रांत और भूटान देश का राष्ट्रीय पक्षी है.
रैवन काले रंग का कौए की तरह का एक पक्षी होता है, जो दुनिया में बहुत जगह पाया जाता है, पर यह अमेरिका और कैनेडा के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में रहनेवाले मूल निवासियों की लोककथाओं का हीरो है। अमेरिका और कैनेडा की खोज से पहले अमेरिका और कैनेडा दो देश नहीं थे, इसलिए रैवन की कथाओं को अमेरिका के मूल निवासियों की लोककथा कहना ही ज्यादा उचित होगा, पर फिर भी ये लोककथाएँ कैनेडा के लोगों में ज्यादा प्रचलित हैं।

अमेरिका के मूल निवासियों में बहुत सारी जनजातियाँ थीं और इन सबमें अलग-अलग लोककथाएँ थीं। रैवन की लोककथाएँ कई जनजातियों में अपने-अपने तरीके से कही-सुनी जाती थीं और लोकप्रिय थीं।

आजकल रैवन कैनेडा देश के यूकोन प्रांत और भूटान देश का राष्ट्रीय पक्षी है और भूटान देश की तो यह शाही टोपी में भी लगा हुआ है।

यह अपने काले रंग, सड़े हुए मांस खाने की आदत और कठोर आवाज की वजह से बहुत अपशकुनी माना जाता है पर फिर भी लोग इसको मारते नहीं हैं। अमेरिका के मूल निवासी इंडियंस के कायोटी की तरह से यह भी उनकी लोककथाओं का एक मुख्य हीरो है। इसकी दुनिया बनानेवाली कहानियाँ बहुत मशहूर हैं।

इसको लोग जन्म और मौत के बीच का बिचौलिया मानते हैं। क्योंकि यह सड़ा हुआ मांस खाता है, इसलिए इसका रिश्ता मरे हुए लोगों और भूतों से है और क्योंकि इसने दुनिया बनाने में बहुत मदद की है, इसलिए इसका रिश्ता जिंदगी से भी है।

रैवन का जिक्र केवल कैनेडा की लोककथाओं में ही नहीं है बल्कि ग्रीस और रोम की दंतकथाओं में भी पाया जाता है। रोम की दंतकथाओं में अपोलो जो भविष्यवाणी करता है, वह उनसे जुड़ा हुआ है। स्वीडन में इसको कत्ल हुए लोगों का भूत मानते हैं। इंग्लैंड में कुछ ऐसा विश्वास है कि यदि रैवन ‘टावर ऑफ लंदन’ से हटा दिए जाएँ तो इग्लैंड का राज्य ही खत्म हो जाएगा।

बाइबिल में भी इसका जिक्र कई जगहों पर आया है। टालमुड में रैवन नोआ की नाव के उन तीन जानवरों में से एक है, जिन्होंने बाढ़ के समय में लैंगिक संबंध स्थापित किए थे और इसीलिए नोआ ने उसको सजा दी थी। कुरान में रैवन ने ऐडम के दो बेटे केन और एबिल में से केन को उसके कत्ल किए हुए भाई को दफनाना सिखाया। हिंदुओं की तुलसीदासजी की लिखी हुई ‘रामचरितमानस’ में यह कागभुशुंडिजी के रूप में आता है और 27 प्रलय देख चुका है। उसमें यह गरुड़ जी को राम-कथा सुनाता है।

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प्रशांत महासागर के उत्तर-पूर्व के लोगों में रैवन की जो लोककथाएँ कही-सुनी जाती हैं, उनसे पता चलता है कि वे लोग अपने वातावरण के कितने अधीन थे और उसकी कितनी इज्जत करते थे।

रैवन अनंसी मकड़ों, कायोटी भेड़िए और मिंक की तरह से कोई भी रूप ले सकता है-जानवर का या आदमी का। वह कहीं भी आ-जा सकता है और उसके बारे में यह पहले से कोई भी नहीं बता सकता कि वह क्या करनेवाला है। वैसे तो वह बहुत ही चालाक है, लेकिन एक बार उसने एक बड़ी सीप में बंद नंगे लोगों के ऊपर दया दिखाई थी। फिर वह अपनी चालबाजी से उनके लिए शिकार, मछली, आग, कपड़े और ऐसी-ऐसी रस्में लेकर आया, जो उनको भूतों और आत्माओं के असर से बचा सकती थीं। उसने प्रकृति से लड़कर उन लोगों को काम के लायक बनाया।

रैवन की भूख बहुत ज्यादा थी और वह अपनी भूख कोई भी चाल खेलकर ही मिटाया करता था, पर अकसर वह चाल उसी पर उलटी पड़ जाती थी।

रैवन की बहुत सारी लोककथाएँ हैं। ‘रैवन की लोककथाएँ–1’ में रैवन के जन्म की, उसकी शक्ल की और उसके पहली-पहली चीजें लाने की 20 लोककथाओं का संकलन किया था। उसके बाद अब ‘रैवन की लोककथाएँ–2’ है जिसमें उसका दूसरे जानवरों के साथ व्यवहार दिखाया गया है। कुछ उसकी शादी की कथाएँ हैं और अंत में एक कथा उसके मरने की। यह कथा यह बताती है कि लोग रैवन को क्यों नहीं मारते।

रैवन की लोककथाएँ
लेखिका : सुषमा गुप्ता
प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन
पृष्ठ : 176

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