साधो ये उत्सव का गाँव : बनारस के ठलुओं की अड़ी और काशी की दिलचस्प यात्रा

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यात्रा के दौरान दिमाग के पन्नों पर जो अनुभूतियाँ दर्ज हुईं, ठलुओं ने उन्हें कागज पर उतारा और किताब बन गई.
काशी की यात्रा का अर्थ है, काशी को समझना, बूझना, थोड़ा गहरे उतरना और इसके परिचय के महासागर में अपने स्व के निर्झर का विसर्जन कर देना। सो कुछ बनारसी ठलुओं ने एक दिन अपनी अड़ी पर यही तय किया। व्यक्ति, समाज, धर्म, संस्कृति और काशी के अबूझ रहस्यों को जानने के लिए क्यों न पंचक्रोशी यात्रा की जाए? पंचक्रोशी यानी काशी की पौराणिक सीमा की परिक्रमा। सो ठलुओं ने परिधि से केंद्र की यह यात्रा शुरू कर दी।

यात्रा अनूठी रही। इस यात्रा में हमने खुद को ढूँढ़ा। जगत को समझा। काशी की महान विरासत को श्रद्धा और आश्चर्य की नजरों से देखा। अंतर्मन से समृद्ध हुए। जीवन को समृद्ध किया। दिनोदिन व्यक्तिपरक होती जा रही इस दुनिया में सामूहिकता के स्वर्ग तलाशे। कुछ विकल्प सोचे। कुछ संकल्प लिये। खँडहर होते अतीत के स्मारकों के नवनिर्माण की मुहिम छेड़ी। यात्रा के प्राप्य ने हमारी चेतना की जमीन उर्वर कर दी।

जब यात्रा पूरी हुई तो ठलुओं ने तय किया कि क्यों न इस यात्रा के अनुभव और वृत्तांत को मनुष्यता के हवाले कर दिया जाए! फिर आनन-फानन में इस पुस्तक की योजना बनी। यात्रा के दौरान दिमाग के पन्नों पर जो अनुभूतियाँ दर्ज हुईं, ठलुओं ने उन्हें इतिहास के सरकंडे से वर्तमान के कागज पर उतारा और यह किताब बन गई....

​यात्रा मनुष्य की नियति है। इसके मूल में जिज्ञासा  होती है। जब भी हमें जानना, समझना और खोजना  होता है, हम यात्रा करते हैं। फिर काशी की तो यात्रा ही  निराली है। महादेव के त्रिशूल पर टिकी हुई इस नगरी की  यात्रा कर सकना भी जीवन का एक सौभाग्य ही है। लोग  काशी में रहते हुए उम्र बिता देते हैं, पर काशी की यात्रा नहीं कर पाते।

काशी की यात्रा का अर्थ है - काशी को समझना,  बूझना, थोड़ा गहरे उतरना और इसके परिचय के महासागर में अपने ‘स्व’ के निर्झर का विसर्जन कर देना। काशी  दुनिया का प्राचीनतम शहर है। इसे जानने और समझने  में युग बीत गए। ऋषि, मुनि, विद्वान्, देव, देवी, साध्वी, संन्यासिन, आध्यात्मिक संत पुरुष, देशी-विदेशी यात्री,  कवि, लेखक और शायरों के माध्यम से काशी की यह ‘अनुभूति यात्रा’ अनवरत जारी रही। सबने अपने-अपने  तरीकों से काशी को ढूँढ़ने की कोशिश की और काशी के ही होकर रह गए।

कुछ बनारसी ठलुओं ने एक दिन अपनी अड़ी पर यह तय किया कि व्यक्ति, समाज, धर्म, संस्कृति और काशी के अबूझ रहस्यों को जानने के लिए क्यों न ​‘पंचक्रोशी यात्रा’ की जाए! पंचक्रोशी यानी काशी की पौराणिक सीमा की परिक्रमा। सो ठलुओं ने परिधि से केंद्र की यह यात्रा शुरू कर दी।

जब यात्रा पूरी हुई तो ठलुओं ने तय किया कि अब इस यात्रा के अनुभव और वृत्तांत को मनुष्यता के हवाले कर दिया जाए। ठलुओं ने अड़ी पर यात्रा को लेकर अपने-अपने अनुभव लिखे। इस पर दूसरे ठलुओं ने प्रतिक्रिया दी। इसीलिए हमने इस किताब में लेखों के साथ प्रतिक्रिया भी दी है, ताकि सनद रहे और वक्त-जरूरत काम आए। आनन-फानन में इस किताब की योजना बनी। यात्रा के दौरान दिमाग के पन्नों पर जो अनुभूतियाँ दर्ज हुईं, ठलुओं ने उन्हें कागज पर उतारा और किताब बन गई।

कोई भी किताब किसी-न-किसी वजह से जन्म लेती है। यह वजह नितांत वैयक्तिक भी होती है। लोक या फिर परलोकवादी भी। हम जीवन की पहली ऐसी यात्रा पर निकले थे, जिसकी वजह सोचने की भी हमें फुरसत नहीं थी। जीवन में कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हमारे भीतर से आनंद का एक अबूझ सा झरना फूट पड़ता है, जिसके मीठेपानी से आत्मा तृप्त हो जाती है। हम फिर न कुछ पूछना चाहते हैं और न कुछ जानना। बस उन क्षणों को उनकी संपूर्णता के साथ जी लेना चाहते हैं, और उसे स्मृतियों की देहरी पर हमेशा के लिए सुसज्जित कर देना चाहते हैं। कुछ इसी मन:स्थिति में पंचक्रोश की यात्रा पर हम अपने कदम रखते जा रहे थे।

अब आप सोच रहे होंगे कि यह ठलुआ कौन है? अड़ी क्या है? और उनकी यह यात्रा क्या गुल खिलाने वाली है? सो भंतो, ठलुवत्व एक बनारसी जीवन-दर्शन है। जीने की कला है। समाज को देखने की दृष्टि है। दुनिया को ठेंगे पर रख अपनी बात को बेलौस कहने की जिद है। ‘ऊधो का लेना, न माधो का देना’ उसका मकसद है। ठलुआ दुःखी हो सकता है, पर रोता नहीं है। वह रोने में भी हँसने का आनंद लेता है। ठलुए में चार कहने और चार सुनने की क्षमता होती है। वह खुद के अलावा समूची दुनिया को मूर्ख समझता है। वह जीवन के राग-रंग से चुस्त-दुरुस्त होने के साथ ही औघड़पन का दिव्य रस पैदा कर  देनेवाली भाँग-ठंडाई का भी शौकीन होता है। भगवान् भोले का यह परम भक्त धन कमाने के कौशल को मूर्खता नहीं, धूर्तता तो जरूर समझता है। ठलुआ भूखा रहेगा, पर किसी के आगे हाथ नहीं पसारेगा। अगर कभी पसारेगा भी तो शेर की तरह गुर्राते हुए।

बनारसी जीवन और समाज में इन ठलुओं का बड़ा महत्त्व है। जिस प्रकार तरकारी में अलुवा, सावन में झलुवा, कुत्तों में कलुआ, पकवान में हलुवा, जंगली जानवर में भलुवा, रिश्तों में पलुवा, शरीर के अंगों में तलुवा और सौदा-सुलभ में घलुआ का महत्त्व है, ठीक उसी प्रकार बनारस में ठलुओं का महत्त्व है। ऐसे ही ठलुओं की एक बेजोड़ अड़ी है अपनी। अड़ी यानी अड्डा। पहले बनारस के  मोहल्ले-मोहल्ले में ऐसे अड्डे हुआ करते थे, पर वक्त कहाँ रुकता है एक जगह टिककर! जीवनयापन के लिए ठलुए बनारस के बाहर निकल गए। सो उन्होंने एक रोज संचार-क्रांति का फायदा उठाया और व्हाट्सएप पर ही अपनी अड़ी बना ली। और नाम रखा ‘ठलुओं’ की अड़ी।

तो यह अड़ी है क्या? अगर आप इसकी जड़ें खोजने के लिए निकलेंगे तो यह सिवाय आनंद कानन (आज का बनारस) के अलावा कहीं और नहीं मिलेंगी। बनारस का स्वभाव आपमें से ज्यादातर लोग जानते ही हैं। यह अजीब-सा शहर है। जो दिल में तो उतर जाता है, पर दिमाग में नहीं समाता। आपने दिमाग लगाया नहीं कि गए! बंद मुट्ठी में सरकती हुई रेत की तरह। कुछ-कुछ ऐसा ही है इस समाज का सत्य।

यहाँ जोर-जबरदस्ती से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है। बनारस ऐसा शहर नहीं कि आप कहीं से आए, दो दिन घूमे और चल ‌दिए। यदि आपने ऐसा  किया, तो आपके पल्ले कुछ भी पड़नेवाला नहीं। यह शहर टिकने की राह देखता है। यहाँ रुकने की, थोड़ा ठहरने की और इसकी दुनिया में विलीन हो जाने की सबसे अलग परंपरा है। यहाँ आकर खुद को स्वयं के बंधनों से मुक्त कीजिए और फिर गंगा की लहरों के सहारे छोड़ दीजिए। शायद आप किसी ऐसे किनारे जा लगें, जहाँ आपकी भेंट तुलसी से हो जाए। शायद आपको कभी कबीर के दर्शन हो जाएँ! जूता गाँठते रैदास दिख जाएँ! शायद ‘चिराग-ए-दैर’ लिखते हुए गालिब चचा दिख जाएँ! क्या पता शंकराचार्य को टोकता हुआ कोई शूद्र भी आपकी नजरों के दायरे में आ जाए।

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तो मित्रो, बनारस एक शहर नहीं, एक लत है, एक नशा है। ठलुओं की  यह अड़ी उसका ही प्रतिबिंब है। बनारसीपन एक जीवन-शैली है। इस शैली में  जिसे जीना आ गया, वह समझिए कि तर गया। पर इसके लिए पूरी तरह बूड़ना (डूबना) पड़ेगा। कवि बिहारी कह गए हैं-
“तंत्री-नाद कबित्त-रस सरस राग रति-रंग।
अनबूड़े बूड़े तरे जे बूड़े सब अंग।”

यही तो एक ऐसा शहर है, जहाँ सीना ठोककर मौत का सामना किया जाता है। मौज में तो वही जी सकता है, जो मौत से न डरे। जीवन जीने का मजा उससे  ज्यादा और कौन ले सकता है? यही इस अड़ी का दर्शन है। दूसरे विश्वयुद्ध के दौर में दारानगर के रामधन सरदार की ऐसी ही एक चाय की अड़ी पर रोज सुबह अखबार बाँचकर मेरे पिता ने अपने भीतर साहित्यिक संस्कारों की नींव डाली थी। वे अड़ी पर मौजूद लोगों को विश्वयुद्ध की खबरें सुनाते थे। बदले में उन्हें मिलती थी मुफ्त की चाय और कभी-कभी ​दूध की मलाई। एक से तन पुष्ट होता था, दूसरे से दिमाग। मेरे पिता की यह अड़ीबाजी मुझे विरासत में मिली है।

बनारस में अड़ियों का अपना इतिहास रहा है। यहाँ साल 1875 में भारतेंदुजी की अड़ी सबसे पुरानी अड़ी हुआ करती थी। बेचारे अड़ी पर सबका आतिथ्य-सत्कार करते-करते कर्ज में डूब गए। भारतेंदु अपनी अड़ी पर नोट जलाया करते थे। वे कहते थे-इन रुपयों ने मेरे खानदान को जलाया है, अब मैं इसे जला रहा हूँ। भारतेंदु परिवार के ही सेठ अमीचंद ईस्ट इंडिया कंपनी के खजाँची थे। इसलिए राष्ट्रवादी उन्हें अंग्रेज़ों का पिट्ठू कहते थे। काशी में शास्त्रार्थ की परंपरा प्राचीन काल से ही चली आ रही है। काशी के पंडित प्रायः रोज ही संगोष्ठियों का आयोजन करते थे। यहाँ हुआ आदिगुरु शंकराचार्य और मंडन मिश्र का शास्त्रार्थ इतिहास प्रसिद्ध है। दूसरा शास्त्रार्थ करीब 150 साल पहले सन् 1869 में आज के दुर्गाकुंड के पास स्थित आनंदबाग में काशी के सनातनी पंडितों और स्वामी दयानंद सरस्वती के बीच हुआ था।

इस शहर का मूल चरित्र ही ऐसे पांडित्यपर्ण शास्त्रार्थों से भरा है। इसी परंपरा में मुहल्लों में लगनेवाली अड़ियों में रोचक शास्त्रार्थ या बहस-मुबाहसों का सिलसिला चल पड़ा। काशी में गली, चौराहे, घाट, चाय-पान की दुकान, कहीं पर भी भाई लोग अड़ी जमा लेते हैं। अलग-अलग मुहल्ले की अलग-अलग अड़ी होती है। यहाँ होने वाली बहसें संसद से कम रोचक नहीं होती हैं। ठलुओं की अड़ी पर भी ऐसी ही रोचक और मजेदार बहस होती है। मौजूदा बनारस की साहित्यिक अड्डेबाजी, जिसे ‘अड़ी’ कहते हैं, बहुत कुछ उसी शास्त्रार्थ परंपरा का विस्तार है। यहाँ जीत-हार तो नहीं होती, लेकिन बहस जमकर होती है। साहित्य से लेकर समाज तक, राजनीति से लेकर इतिहास तक और धर्म से लेकर संस्कृति तक, योनि से लेकर लिंग तक सबकुछ ‘अड़ी’ के विषय होते हैं।

बनारस की कुछ अड़ियाँ काफी चर्चित रही हैं। जैसे-ढेढ़सी के पुल वाली अड़ी, जहाँ कवि राहगीर, लालजी सिंह, श्रीनाथ सिंह, ठाकुर प्रसाद सिंह, बेधड़क बनारसी, भैयाजी बनारसी, त्रिलोचन शास्त्री, धर्मशील चतुर्वेदी, चकाचक बनारसी, साँड़ बनारसी और पद्माकर चौबेजी (रत्नाकर के पिताजी) रोज बैठकी लगाया करते थे। ऐसे ही साधुबेला आश्रम, अस्सी और आनंदबाग (दुर्गाकुंड) की अड़ी में कहानीकार शिवप्रसाद सिंह, कवि केदारनाथ सिंह, धूमिल, चंद्रशेखर मिश्र, नामवर सिंह, हीरालाल चौबे (वासंती के संपादक) और आचार्य सीताराम चतुर्वेदी जैसे नामचीन साहित्यिक लोग अड़ीबाजी करते थे।

एक और अड़ी थी ‘हिंदी प्रचारक संस्थान’ पिशाच मोचन की। उसके कर्ता-धर्ता श्री कृष्णचंद्र बेरी थे, जिनके यहाँ साहित्यकारों की अड़ी लगती थी। यहाँ अकसर मैं भी जाता था। वहाँ जुटने वाले लोगों में एक जमाने में कृष्णदेव प्रसाद गौड़ उर्फ बेढब बनारसी भी होते थे। बाद में इस अड़ी पर डॉ. युगेश्वर, डॉ. विजय बलियाटिक, डॉ. विश्वनाथ प्रसाद, डॉ. इंदीवर, ठाकुर प्रसाद सिंह, डॉ. त्रिभुवन सिंह, सांसद रघुनाथ सिंह, समाजवादी नेता राज नारायण, डॉ. गिरींद्र नाथ शर्मा (आशुतोष शर्मा के पिताजी) और मेरे पिता मनु शर्माजी जैसे अड़ीबाज शामिल होते थे। इसी अड़ी पर पिताश्री ने ऐलान किया था कि ‘‘आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों, परसों नहीं तो बरसों बाद मैं डायनासोर के जीवाश्म की तरह पढ़ा जाऊँगा।’’ बेरी साहब सबका खयाल रखते थे। पाँच से साढ़े छह-सात तक सब यहीं जमा होते। बेरी साहब सबको चाय-नाश्ता कराते। उस समय के प्रसिद्ध हृदय रोग विशेषज्ञ बी.आर. ठकुराल भी यहाँ आते थे और फिजीशियन सैंपल में आनेवाली दवाइयों को साहित्यकारों के बीच बाँटते थे।

पंचक्रोश की इस यात्रा में सबसे पहली चुनौती वक्त ने पेश की। हमने इस यात्रा को 29 अगस्त से शुरू करने का फैसला लिया था। यह भारी उमस का वक्त था। हवाएँ अपनी साँस रोककर ठलुओं के धैर्य की परीक्षा ले रही थीं। पर जब हमने काल से होड़ करने की ठान ही ली थी तो फिर उमस का क्या वजूद था? पंचक्रोशी के यात्री तमाम विपरीत परिस्थितियों को चीरते हुए इतिहास के इस अद्भुत सफर पर निकल पड़े थे। हमारे लिए यह 80 किलोमीटर की दूरी का पंचक्रोश बिल्कुल नहीं था। हम तो काशी की युगों पुरानी विरासत के 80 किलोमीटर पर निकले थे। इस 80 किलोमीटर की लंबाई को रास्ते में जगह-जगह लगे हुए मील के पत्थर नहीं नाप सकते थे। एक-एक किलोमीटर युगों-युगों तक की गहराई में जाता था।

हम काशी की विरासत, परंपरा, संस्कृति और अध्यात्मिकता की अजस्र धाराओं से लबालब होकर लौटे। हमारी आंतरिक संपदा के इस हिमालय से कोई-न-कोई गंगा तो निकलनी ही थी। यह किताब  उसी गंगा के अस्तित्व का पुण्य है।

-हेमंत शर्मा.
(लेखक जानेमाने पत्रकार हैं)

साधो ये उत्सव का गाँव
संपादक : अभिषेक उपाध्याय, अजय सिंह, रत्नाकर चौबे
प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन
पृष्ठ : 272

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