शर्मिष्ठा : कुरु वंश की आदि विद्रोहिणी

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शर्मिष्ठा एक सशक्त नारी, धनुर्धर ,चित्रकार और प्रतिभावान स्त्री के रूप में हमारे समक्ष आती है.
वाणी प्रकाशन से प्रकाशित अणु शक्ति सिंह का उपन्यास शर्मिष्ठा पौराणिक कथा से लिया गया एक पात्र है। हिन्दी साहित्य में मिथकीय पात्र या कथा को लेकर रचे गये कथा साहित्य में नरेन्द्र कोहली का नाम सबसे पहले आता है। इधर अमीश और आशीष नाडकर ने भी काफी काम किया है। शर्मिष्ठा इन सब से भिन्न दृष्टिकोण लेकर आई है। यह एक स्त्री सशक्तीकरण का पात्र है पर साहित्य में यह उपेक्षित रही है। दूसरी महत्वपूर्ण बात है एक स्त्री का स्त्री के प्रति दृष्टिकोण।

शर्मिष्ठा अतीतोन्मुख होते हुए भी समकालीन संदर्भो से अपने आप को कड़ी सहजता से जोड़ती है। अणु शक्ति सिंह का औपन्यासिक कौशल इस दृष्टि से सफल रहा है। शर्मिष्ठा एतिहासिक पात्र होते भी अपनी विचारधारा के कारण आधुनिक है और अपने चरित्र गठन में आज की शिक्षित स्त्री का प्रतिविम्ब है। तत्कालीन परिवेश में बिना सामाजिक स्वीकृति के विवाह करने और उसके पश्चात प्रेमी को छोडकर एकल माँ बनने का निर्णय विद्रोही व्यक्तित्व को ही नहीं दर्शाता बल्कि शर्मिष्ठा के साहसिक होने का भी प्रमाण प्रस्तुत करता है।

मिथकीय कथानक और पात्र को चयन करने के बड़े खतरे हैं। प्रथम तो यह कि पाठक कथानक से पूर्व परिचित होता है इसलिए वह नवीनता न पाने की विचारधारा बना बैठता है और दूसरा सबसे बड़ा खतरा है अतीत और वर्तमान का साथ-साथ निर्वाह करना। यहाँ यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि अणुशक्ति सिंह ने इन दोनों खतरों को उठाने का साहस ही नहीं किया बल्कि उसे पूरी ईमानदारी से निभाया है। शर्मिष्ठा के कथानक में रचनाकार ने अपनी तरफ से कुछ तत्व जोड़ दिए है जो वर्तमान में आवश्यक थे। ययाति एक हजार साल बाद पुरू को उसका यौवन लौटाते हैं जो इस उपन्यास में नहीं आया  है।
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शर्मिष्ठा : पौराणिक नायिका के संघर्ष की मनोरंजक दास्तान

चरित्र की दृष्टि से अगर हम देखे तो मुख्य पात्र शर्मिष्ठा, ययाति और देवयानी है। ययाति का चरित्र पाठक को बेचैन करता है। कहीं पाठक को उसके कृत्य पर क्षोभ होता है तो कहीं संवेदना उत्पन्न होती है। ययाति के चरित्र सृजन में अणुशक्ति पूर्ण सफल हुई हैं। क्योंकि पाठक उन्हें कभी अतीतोन्मुख कथानक और कभी आधुनिक स्त्री शर्मिष्ठा के अनुरूप तौलता है। देवयानी और शर्मिष्ठा के चरित्रांकन में अणुशक्ति ने स्त्री मनोविज्ञान की सूक्ष्म पकड़ को दर्शाया है। देवयानी का क्रोध, ईर्ष्या, महत्वाकांक्षा को बड़ी बारीकी से कथानक में गूँथ दिया है। अणुशक्ति की यह बड़ी खूबी रही है कि हर पात्र अपनी परिस्थिति के अनुरूप अपना विचार और व्यवहार रखता है। यही कारण है कि पूरे उपन्यास में देवयानी खलनायिका की रूढ़ी का निर्वाह नहीं करती है। अपनी ईर्ष्या, महत्वाकांक्षा, बदला लेने की प्रवृत्ति ययाति को विवाह के लिए मजबूर करने और शर्मिष्ठा को दासी बनाने के सभी कृत्यों के बावजूद देवयानी अणुशक्ति की कलम से नकारात्मकता नहीं लिखवा पाती हैं। इस दृष्टि से अणुशक्ति बहुत कुशल सिद्ध होती हैं। उपन्यास पढ़ते हुए कोध और सहानुभूति दोनों भाव जागेंगे। एक पात्र के लिए पाठक दो विरोधी भाव रखता है चाहे वह ययाति हो या देवयानी। यह वैशिष्ट्य अणु शक्ति को अन्य स्वनाकारों से अलग करता है।

अब बात करते हैं उपन्यास के केंद्रिय पात्र शर्मिष्ठा की। शर्मिष्ठा का चरित्र जितना दृढ़ है उतना ही दृढ़तापूर्वक अणु ने उन्हें रखा है। अणुशक्ति ने शर्मिष्ठा के मन, उसकी आत्मा  को कोमलता से पाठक के समक्ष उभारा है। अपने में सभी गुण होते हुए भी स्त्री कैसे छली जाती है (स्त्री से भी और पुरूष से भी) इसका सबसे बड़ा उदाहरण शर्मिष्ठा है। कर्तव्य और प्रेम ही स्त्री को परास्त करते हैं यह अनद्यतन सत्य है। अणु शक्ति इस सत्य से वाक़िफ़ है।

अणुशक्ति ने शर्मिष्ठा को भीतर तक महसूस किया है उसे जिया है तभी तो पाठक शर्मिष्ठा से गुजरते हुए अणु से एक तार होकर जुड़ जाता है। स्त्री का प्रेम, उसकी नियति उसका त्याग सब कुछ शर्मिष्ठा के माध्यम से अणु शक्ति ने महसूस कराया है। शर्मिष्ठा एक सशक्त नारी, धनुर्धर ,चित्रकार और प्रतिभावान स्त्री के रूप में हमारे समक्ष आती है।

शर्मिष्ठा का प्रेम बड़े संवेदनापूर्ण और सरस रूप उपन्यास में चित्रित हुआ है। यह प्रेम पवित्र है और इसमें कही कुण्ठा का भाव नहीं है। स्त्री मन की दृष्टि से ययाति और शर्मिष्ठा का प्रेम रूपाकार पाता है, जो उपन्यास की बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है। शर्मिष्ठा का प्रेम उसके लिए विडम्बना और पीड़ा को ले आता है।

उपन्यासकार को सफलता इसमें है कि उस विडम्बना और पीड़ा को पाठक के मन में उसी रूप में उतार देती है जैसी वह है। शर्मिष्ठा का संर्घष आज की स्त्री का संघर्ष बन जाता है। जब वह सामाजिक मानदण्ड के अनुरूप विवाह नहीं करती पर प्रेम करती है तब उसकी स्वतन्त्रता पर सवाल तो खड़े ही होंगे। इसके साथ ही एकल माँ के रूप में सामाजिक आर्थिक संघर्ष भी शर्मिष्ठा को समकालीन सन्दर्भ में प्रस्तुत करते हैं। शर्मिष्ठा के माध्यम से अणुशक्ति पितृसत्ता के ढाँचे और पुरुषवादी मानसिकता पर प्रहार करती है पर बहुत कोमलता से। वह कहती हैं ---- "जिसकी कोमलता पितृसत्तामक समाज की निष्ठुरता के हाथों कई बार घायल हुई है तो कई बार वे स्वयं उस पितृसत्ता के पोषण की तरह दिखते हैं।"

पुरुष सदैव स्वार्थी रहा है। ययाति इसका पर्याय बन कर उभरता है। उपन्यास में कई स्थलों पर अणुशक्ति ने बडी खुबसूरती से रेखांकित किया है। वह कहती है' -"क्या संसार की कोई जगह इन पुरुषों ने स्त्रियों के लिए सुरक्षित छोड़ी है?"

इस तरह के कई छोटे छोटे वाक्यांश समकालीन स्त्री विमर्श से अनायास ही जुड़ते चले जाते है। शर्मिष्ठा का हर साहसिक निर्णय प्रेम, गर्भ धारण, एकल माँ वर्तमान संदर्भ में स्त्री विमर्श के कई स्तरों को रेखांकित करता है। स्त्री अस्तित्व स्थापना का साकार रूप हम शर्मिष्ठा में पाते हैं। शर्मिष्ठा उपन्यास पौराणिक होते हुए भी अपनी प्रगतिशील विचारधारा के कारण आधुनिक है। शर्मिष्ठा का पूत्रवधु के लिए रूदन भविष्य की ओर संकेत करता।

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पितृसत्तात्मक जड्ता, धर्म -समाज का बाह्याडम्बर और उसमें पिसती स्त्री का संवेदनात्मक चित्रण अणुशक्ति की कलम से साकार हुआ है। उपन्यास पढ़ते हुए में शर्मिष्ठा अपने आसपास दिखाई देने लगती है। सारे पात्र समकालीन परिवेश में भी स्त्री विडम्बना को प्रदर्शित करने लगते हैं। हम यह महसूस करते हैं कि पौराणिकता का बाह्य आवरण हटा दें तो आज भी समाज का वही रूप है। स्त्री के लिए समाज नहीं बदलता है। अपनी पौराणिक आधुनिकता के अतिरिक्त यह उपन्यास संवेदना के कई स्तरों को निखारता है। प्रेम, ईर्ष्या आदि कई स्तरों के अतिरिक्त यह मानव सभ्यता से होता हुआ अन्य चराचर जगत पर भी कुछ न कुछ कहता है। उपन्यास से एक प्रसंग द्रष्टव्य है --"तानों उलाहनों के इसी क्रम में शर्मिष्ठा ने देवयानी से कह दिया शाकाहारी होने के पश्चात भी वह किस प्रकार से पक्षियों और जानवरों का शिकार कर लेती है। देवयानी ने दूर किसी शाख पर बैठी चिड़िया को भेदने के लिए प्रत्यंचा चढ़ाते हुए जवाब दिया था - "आखेट तो मनोरंजन है, इसका आहार से क्या लेना देना।" 'मनोरंजन किसी और की वेदना पर" शर्मिष्ठा औचक है। पूछ बैठी थी।''

उपर्युक्त उदाहरण अणु की भाषा कुशलता का श्रेष्ठ उदाहरण है। पूरे उपन्यास में ऐसे प्रतीकात्मक वक्तव्य भरे पड़े हैं। भाषा की यह प्रतिकात्मकता कहीं व्यंग्य रुप में तो कही कथानक के निर्वाह में है। कथानक प्रेषण में बिम्ब निर्माण अणु शक्ति ने अधिकांश स्थलों पर किया है। यह बिम्ब अपनी पूर्णता में चित्र विधान शैली की परंपरा का निर्वहन करते हैं। एक शब्द-चित्र देखा जा सकता है - "घूमने में बाल महाराज के मुख को छूते हुए निकल गये। शर्मिष्ठा सामने ऐसे खड़ी थी जैसे चाँद अभी बादलों की ओट से निकला है।”

अणुशक्ति का शब्द चयन तत्कालीन परिवेशानूकूल है। राज घराने में महाराज और राजकुमारियाँ जिस भाषा का प्रयोग करते वैसी ही भाषा का कथानूरूप चयन अणुशक्ति  के द्वारा हुआ है। भाषा में कहीं भी क्लिष्टता का समावेश नहीं हुआ है। भाषा सरस प्रवाह पूर्ण है। इतने बड़े परिवेश व समाज को समेटने में भाषा पूरी तरह से समर्थ रही है। अपने वैशिष्ट्य के कारण यह उपन्यास लम्बे समय तक याद किया जायेगा।

-डॉ. शुभा श्रीवास्तव

(डॉ. शुभा  राजकीय क्वींस कालेज, वाराणसी में प्रवक्ता हैं )

शर्मिष्ठा : कुरु वंश की आदि विद्रोहिणी
लेखिका : अणुशक्ति सिंह
प्रकाशक : वाणी प्रकाशन
पृष्ठ : 150

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