वाणी प्रकाशन से जल्द आ रहा है राजेश तैलंग का पहला कविता संग्रह ‘चाँद पे चाय’

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अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त कलाकार राजेश तैलंग का पहला काव्य संग्रह ‘चाँद पे चाय’ वाणी प्रकाशन ग्रुप से शीघ्र प्रकाश्य है।

राजेश तैलंग एक बेहतरीन अदाकार हैं। अभिनय की जिन महीन संज्ञाओं द्वारा उन्होंने ख़ुद को एक उच्च श्रेणी के कलाकार के रूप में स्थापित किया है, ठीक उसी विधि का अनुसन्धान उनकी लिखी कविताओं में देखने को मिलता है।

राजेश तैलंग का नवीन काव्य-संग्रह 'चाँद पे चाय' में प्रेम के गहरे क्षणों की कविताओं में अचानक शून्य की परिधि दिखाई देने लगती है। ‘तुम-दो अक्षर’, ‘मैं-आधा अक्षर’, ‘हम-ढाई अक्षर-इन’ तीन खण्डों में फैली राजेश तैलंग की कविताएँ घटनाओं के मध्य संकेतों की सुन्दर भाषा है। क्या सम्भव हो सकता है और किस चीज़ की सम्भावना बन रही है या जो अनुपस्थित है उसकी तलाश में एक गति बनी हुई प्रतीत होती है। इतिहास में ख़ुद की शिनाख़्त करती ये कविताएँ किसी भी तरह की अपेक्षा की उम्मीद को ख़ारिज करती हैं। वे लगातार संवादरत हैं, जैसे दीवार घड़ी का पेंडुलम अपनी गति की लय को कभी नहीं छोड़ता। निविड़ अँधेरे के गर्भ से निकलकर एक नव भ्रूण पहली बार अचम्भे से संसार को हल्की रोशनी में देखता है। जब 'दो ग्राम रूह' जैसे रूपक कविता की स्वायत्तता पर अपना सम्पूर्ण अधिकार बना लें तो मान लेना चाहिए कि जीवन का कोई सूक्ष्म धागा कवि ने खोज लिया है।

जीवन में जितना स्थान प्रेम घेरता है, उसी अनुपात में पीड़ा की रिक्तता भी अपना हक़ माँगने आ जाती है। हम एक साथ आये/एक कहानी बनी/हम दोनों अलग हुए/तीन कहानियाँ बनीं/ ऐसे एक नहीं कई उदाहरण हैं इस काव्य-संग्रह में जो धुँधले ही सही लेकिन जीवन की स्वाभाविक कठोरता को अनुशासन में दिखाते हैं। अप्रेम, प्रेम का विलोम नहीं/प्रेम का पर्याय है/एक अक्षर का योग है/ढाई का साढ़े तीन है/जो गणित से भी/और व्याकरण से/भी बाहर है। इन कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि कला जीवन से व्यर्थ में ही स्मृतियों के प्रश्न नहीं करती बल्कि जीवन की विराट शुभेच्छाओं को अपनी प्रबल हथेलियों में थामे उन स्मृतिचिन्हों का पीछा करती रहती है।

एक सरल अनुभूति व गहनतम दृष्टि से फंतासी की निर्ममता से मुक्त राजेश तैलंग की कविताएँ इतनी स्पष्ट और व्यापक हैं कि इन्हें पढ़कर एक बार भी यह अहसास नहीं होता कि यह पाठक को इन कविताओं के पढ़े जाने के बाद बने प्रभाव से सरलता से खींच लेंगी। ये कविताएँ न आग्रह करती हैं न निरीह होने की कामना करती हैं। ये केवल इतना भर चाहती हैं कि कोई उनके पास चाय लेकर बैठे और थोड़ी देर इन्हें गुनगुनाये। एक रस जो सर्वव्यापी प्रेम, बिछोह और स्मृति का प्रणेता है जो किसी भी सांसारिक महत्वाकांक्षा को एक क्षण में मिटा दे, जो स्मृतियों की आभा को विशिष्ट बना दे, ऐसी सुदीप्ति के मध्य ये कविताएँ स्वयं के होने की पुष्टि करती हैं।

मेरा हृदय एक वृक्ष/आओ खरोंचो मेरा वक्ष/अपने नखों की धार पैनी करो/मैं समय के साथ/दूसरी छाल उगा लूँगा। जीवन के विशालकाय बिम्बों को साहस के साथ लिखना ही एक कवि का सत्य कर्म होता है फिर चाहे उसे समाज की कितनी ही उपेक्षाओं का सामना करना पड़े। इन कविताओं में कहीं-कहीं तो इस अदम्य साहस में वीरानापन भी दिखाई देता है लेकिन कवि इसे यथासम्भव सँभाल भी लेता है। ऐसा बोध और ईमानदारी न्यूनतम को वैश्विक बनाकर उसे पूर्णतया अपनी ध्वनि से सुवासित कर देती है। राजेश तैलंग की कविताएँ कह पाने का सामर्थ्य स्वयं दे देती हैं बशर्ते उन ध्वनियों के संकेतों को कोमलता से सुना जाये।